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Jul 23, 2011

एक लम्हा, एक सदी जैसा बना देगा तुझे – विवेक मिश्र



परिन्दे क्यों नहीं लौटे - ग़ज़ल संग्रह
कवि - पं. कृष्णानंद चौबे
प्रकाशक - पाँखी प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य - रू 120/-


एक लम्हा, एक सदी जैसा बना देगा तुझे

कृष्णानन्द चौबे जी के अन्दर का शायर कोई रहबर या नासेह नहीं है। वह एक आम आदमी है और उसी की ही ज़ुबान में एक आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख और चुनौतियों को बेबाकी से बयाँ करता है और यही बात उनकी शायरी को ख़ास बना देती है। उनकी शायरी में इंसानियत सबसे बड़ा मज़हब है। उनकी ग़ज़लें वक़्त की नब्ज़ टटोलती चलती हैं। वे बेहद शाइस्तगी से कही गईं ऐसी ग़ज़लें हैं जो एक मुश्किलों से घिरे सम में उस इंसा की ज़ुबा बनती हैं, जिससे बोलने का हक़ छिन चुका है। कृष्णानन्द जी की शायरी किताबों से सीखी गई शायरी नहीं, उनकी शायरी ज़िंदगी के बाग़ - ग़ीचों से चुने गए गुलों और ख़ारों के मिलने से बनी है। उन्होंने मज़ाहिया, तन्ज़िया, गीत एवं गद्य लेखन आदि के बाद ग़ज़ल को साधा, पर ग़ज़ल से मिलने के बाद वे उसी के हो गए। वह इसको कुछ यूँ इज़हार ते हैं:-

कुछ देर तक तो मैं सभी को देखता रहा

देखा उसे तो फिर उसी को देखता रहा

उनकी शायरी ज़िंदगी की दुश्वारियों, उससे जद्दो-जहद की शायरी तो है पर उस में शिकस्त नहीं है बल्कि एक उम्मीद है, आम आदमी के जीतने की उम्मीद:-

आप जब भी कभी दिल को बहलायेंगे

सिर्फ़ मेरी कहानी दोहरायेंगे

ख़्वाब रूठे हुए हैं मगर हम उन्हें

नींद के घर से इक दिन मना लायेंगे

कायमगंज, फ़र्रुख़ाबाद में एक ब्राह्मण ख़ानदान में पैदाईश, बनारस और इलाहाबाद में परवरिश कानपुर में आकर बसने वाले कृष्णानन्द चौबे जी ने कट्टर मज़हबी माहौल के बीच से गुज़रते हुए, पुराने जर्जर हो चुके स्मों-रिवाज़ों की दीवारों को तोड़ा ज़ात-पात और मज़हब से ऊपर उठकर फ़िरकापरस्त ताक़तों के ख़िलाफ़ लिखा:-

दिन में वो दोस्त सा लगता है, रात दुश्मन सा

हरेक शख़्स अब दो-दो नक़ाब रखता है

हमें दिखाता है मज़हब की नई तस्वीरें

वो अपने दिल में पुरानी किताब रखता है

कृष्णानन्द चौबे जी का यह ग़ज़लों का मजमुआँ सालों-साल उनके चाहने वालों को उनकी मौजूदगी का एहसास दिलाता रहेगा। उन्होंने अपना जीवन एक फ़क़ीराना अंदाज़ से जिया, बहुतों को बहुत कुछ सिखाया, बेशुमार दोस्त बनाए और जाते-जाते अपनों को ही अपनी ग़ज़लें सौंप कर रुख़सत हुए। शायद उनका यह शेर उन्हीं एहबाबों के लिए हो:-

तुम्हारा फ़र्ज़ बनता हो तो इसको तो इसको ले चलो आगे

हमारा काम था हम गए हैं कारवाँ लेकर

वाक़ई यह हमारा, हम जैसे उनके बहुत से चाहने वालों का फ़र्ज़ बनता है कि यह कारवाँ कहीं भी, कभी भी रूके। शायद उन्हें भी शायरी की यह विरासत अपनों को सौंपते हुए यह एतमाद् था, जब उन्होंने कहा:-

उड़ानों से तो लगता है कि ये छोटे परिंदे भी

ज़मीं पर लौट आएंगे किसी दिन आसमाँ लेकर

आज उनका कलाम छपना, वाक़ई, उनकी यादों का, उनकी ग़ज़लों का आसमाँ से ज़मीं पर उतरने जैसा है और यह हमारे और उनके दोनों के लिए हमेशा याद रह जाने वाला पल है। यक़ीनन उनके अशआर, उनकी शायरी अदब की दुनिया में एक पुख़्ता मयार और मक़ाम हासिल करेगें इस से आगे की बात अगर उनके ही शेर में कहें तो यूँ होगी:-

इस यक़ीं के साथ में लड़ता रहूँगा वक़्त से

कोई लम्हा एक सदी जैसा बनाएगा मुझे

और न मिसरों के बाद सिर्फ़ एक ही शब्द कहा जा सकता है, और वह हैआमीन

-विवेक मिश्र-