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Jul 24, 2011

मन के मूल का अनुवाद है कविता - विवेक मिश्र



काव्य संग्रह - मन वातायन
कवयित्री - डॉ. कौशल्या गुप्ता
प्रकाशक - पाँखी प्रकाशन
मूल्य - रू. 160/-


कविता, कवि और कवि का जीवन-वृत्त यूँ तो ये अलग-अलग बिन्दु प्रतीत होते हैं, परन्तु जीवन के वृह्त्तर आयामों में इन तीनों बिन्दुओं को परखने पर यह मानवीय सभ्यताओं की यात्रा में जीवन के एक ही घेरे में चमकते दिखाई देते हैं, अर्थात एक कवि की कविता, उसका व्यक्तित्व और उसका जीवन-वृत्त बाहर से भले ही अलग-अलग दिखते हों पर कहीं न कहीं रचनात्मक धरातल पर यह तीनों ही इस तरह आपस में घुले-मिले होते हैं कि न तो इन्हें बिलगाना ही संभव होता है और न ही एक के बिना दूसरे को समझ पाना। कौशल्या जी की कविताओं में भी इसी तरह उनके कवि मन की उथल-पुथल, उनके एक तटस्थ दृष्टा के समान स्थिर व्यक्तित्व और उतार-चढ़ावों से भरे जीवन के अनेकों पहलुओं की रलमल उपस्थिती दिखाई देती है। उन्हीं की एक कविता की पंक्तियाँ हैं

कविता अनुवाद है

मन की बोली का

मन के मूल का

उनका जीवन, शिक्षा, शोध और विभिन्न देशों की संस्कृतियों को देखता, स्पर्श करता और कहीं-कहीं उनमें डूबता- उतराता आगे बढ़ता रहा है। कभी, कहीं पल दो पल को किनारे लगा भी तो वक़्त के थपेड़ों ने फिर उसे नई दिशाओं में धकेल दिया। कई बार उन्होंने स्वंय भी, जिज्ञासा बस नई दिशाओं को जानने, समझने, शोध करने का रास्ता चुना। क्योंकि उनके मन में एक कवि की व्यग्रता थी। एक ऐसी बेचैनी थी जो हमेशा ज़िंदगी के समन्दर की थाह लेने को आकुल रहती है। एक जगह वह लिखती हैं-

बूँद बिली

ज़रा सागर की

थाह तो ले लूँ

कितना गहरा है

……और कूद पड़ी।

और यह सागर की थाह लेने की मनसा अनायास या अकारण ही नहीं उपजी, यह कवि के साथ ही पैदा होती है। यह अच्छे-बुरे समय में कवि के साथ-साथ चलती है। कवि मन की यह मनसा ही कवि को वह सब दिखाती है, जो और लोगों की आँखों के सामने होते हुए भी वे उसे नहीं देख पाते। कवि उन ओझल चीज़ों को बोता, काटता और बरतता है, जो सामने होकर भी नहीं हैं, जिन्हें उनके आस-पास बैठे लोग सिर्फ़ कविताओं की खिड़कियों से ही देख पाते हैं। कवि समाज को मात्र कवितायें नहीं देता, वह समाज को ऐसा चश्मा देता है, जिस से समाज जीवन की कई पर्तों के नीचे छुपी दुनिया को बिल्कुल साफ़-साफ़ देख पाता है। वह देख पाता है कि इस विराट अराजकता के बीच जब कोई एक पल स्थिर हो जाता है, तो वह ठीक-ठीक कैसा दिखता है। कविता से हम उस समय को देखते ही नहीं बल्कि उसे छू भी पाते हैं। ऐसी ही एक स्थिर क्षण में कौशल्या जी ने एक जगह लिखा है

काल टटोलती

शिशु की

नन्हीं उंगलियाँ।

कविता में हज़ारों वर्षों का सफ़र पलों में संभव है। कवि के साथ हम क्षण भर में एक युग से दूसरे युग में तिर जाते हैं। पलकों के झपकने या तितलियों के परों के काँपने की ध्वनियों को भी सुन पाते हैं। कविता ओझल मनोभावों का मनोविज्ञान है। या कहें कि बिना बहे आँसुओं के भाप बन जाने की क्रिया को, काग़ज़ पर उतार लेना ही कविता है। और ऐसा कौशल्या जी की कविताओं में बार-बार होता है।

बीज बोकर

छाया बो दी

गन्ध बो दी

पर जीवन में कवि का कवि बने रह पाना। अपने भीतर के कवि के साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी पाना सरल नहीं होता। यह कवि के जीवन को चुनौतियों से भर देता है। उसके भीतर और बाहर की दुनिया के द्वन्द्व उसे हमेशा बेचैन रखते हैं और जो इस द्वन्द्व के साथ रहना सीख जाता है, वही कह पाता है

कैकटस का बाग़

तितलियों की सैरगाह नहीं

वह स्वंय तो चुनौतियों का सामना करता ही है, इसके साथ-साथ समय को चेताता हुआ आगे बढ़ता है और कविता के सदा जीवित एवं स्वतंत्र रहने की घोषणा करता है

सुन सकते हो

गीत

बन्दी नहीं बना सकते।

कौशल्या जी की कविताएँ बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती हैं। वह कई स्थानों पर पाठक की भी परीक्षा लेती हैं। यह सरसरी तौर पर जल्दी से पढ़ ली जाने वाली कविताएँ नहीं हैं। यह पढ़ कर तसल्ली से महसूस की जा सकने वाली कविताएँ हैं। अपनी कविताओं में ही एक जगह वह इस ओर इशारा भी करती हैं

चिड़िया चुप हो गई

कोयल ने मुंह पर उंगली रख ली

कौआ पूछने लगा

कहाँ है मौन?

सचमुच कौशल्या जी के इस संग्रह की कविताएँ अद्भुत बिम्बों के माध्यमों से कई रहस्यमय प्रतीकों तक पहुँचती हैं।

कुहरे में लिपटा

चाँद सा दिखता

ताल के जल में

नहाता सूरज

काँप रहा था

सर्दी से

लहरों के संग-संग्।

आलोक स्पर्श और क्षितिज का सीमान्त के बाद यह डॉ कौशल्या गुप्ता जी का तीसरा काव्य संग्रह है। उनकी काव्य यात्रा पिछले पाँच दशकों से सतत प्रवाहमय है। उनके लेख, शोध तथा कविताएँ समय-समय पर देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कविताओं में एक ऐसी ताज़गी है जो उन्हें हमेशा नया बनाए रखती है। हमारे लिए वह कभी न चुकने वाली अमुल्य निधि है। कितनी ही बार पढ़ी जाए कोई किताब, उसके शब्दों के अर्थ समाप्त नहीं होते।

कौशल्या जी की कविताएँ दूर-दूर पहुँचे। लोगों के मन को छुएँ, उस में बसें और नित नए अर्थ उद्घाटित करें, ऐसी शुभकामनाओं के साथ।

- विवेक मिश्र -

Jul 22, 2011




180 डिग्री का मोड़ - काव्‍य संग्रह का लोकार्पण 27/05/2011

भारतीय सांस्‍कृतिक सम्‍बन्‍ध परिषद के तत्‍वावधान में आज़ाद भवन सभागार में लेखिका एवं कवयित्री पुष्‍पलता शर्मा पुष्‍पी द्वारा लिखित एवं हिन्‍दी अकादमी दिल्‍ली के सहयोग से प्रकाशित प्रथम काव्‍य संग्रह 180 डिग्री का मोड़ का लोकार्पण हास्‍य और व्‍यंग्‍य कवि श्री सुरेन्‍द्र शर्मा तथा आई सी सी आर के उप महानिदेशक श्री अनवर हलीम के कर-कमलों द्वारा सम्‍पन्‍न हुआ ।

समारोह में कवयित्री पुष्‍पलता शर्मा ने अपनी रचनाधर्मिता को विवशता और आक्रोश इन दो सिरों के बीच जीवन्‍त बताते हुए कहा कि जहॉं उनकी कविताऍं उनकी विवशता, पीड़ा एवं प्रश्‍न हैं वहीं उनके लेख विवशता से उपजा आक्रोश है । पुष्‍पलता ने अपने संग्रह से नदी, मार्च की बारिश, मुर्दे, अस्तित्‍व की कील, एंटीडोट और 180 डिग्री का मोड़ आदि का पाठ किया जिसे श्रोताओं ने काफी सराहा ।

किताब पर अपने विचार व्‍यक्‍त करते हुए मुख्‍य अतिथि श्री अनवर हलीम ने कवयित्री की प्रतिभा का जिक्र करते हुए कविताओं के व्‍यापक फलक और उनके साहस की सराहना और संग्रह के शीर्षक की सार्थकता की प्रशंसा की ।

विशिष्‍ट अतिथि डॉ. लक्ष्‍मीशंकर वाजपेयी ने कविताओं के विषय-वैविध्‍य का जि़क्र करते हुए कवयित्री की अंग्रेजी़ शब्‍दों से युक्‍त व्‍यंग्‍य कविता हिन्‍दी डे सेलेब्रेशन की ओर इंगित किया और छोटी के साथ ही बड़ी कविताओं के लेखन की क्षमता की प्रशंसा करते हुए संग्रह की देह हो तुम कविता का जिक्र किया । पुष्‍पलता की कविताओं में प्रतीकात्‍मकता की ओर इशारा करते हुए उन्‍होंने संग्रह से कुछ कविताओं के उद्धरण भी दिए जैसे

पुकारता रहा हूँ किनारे खड़े माझी को

उसी से पूछ लो मेरे, डूबने की वजह क्‍या है*

चिर सत्‍य के दर्पण में जब भी देखा अक्‍स

जि़न्‍दगी की तसवीर कहीं, दरक गई-सी लगती है*

समारोह के अध्‍यक्ष श्री सुरेन्‍द्र शर्मा ने कवयित्री की कविताओं में मूल्‍यबोध, संवेदनशीलता, कविताओं के व्‍यापक कैनवास की चर्चा करते हुए उनके लेखों की भी प्रशंसा की और कहा कि कविता एवं लेख दोनों का साथ में लेखन बेहद कठिन काम है क्‍योंकि जहॉं लेख में बूँद को सागर तक फैलाना होता है वहीं कविता में सागर को बूँद तक लाना होता है और पुष्‍पलता ने यह काम बख़ूबी किया है । समारोह में उपस्थित लोगों ने जहॉं हास्‍य एवं व्‍यंग्‍य कवि सुरेन्‍द्र शर्मा की हास्‍योक्तियों का भरपूर आनन्‍द लिया वहीं कवयित्री की सबसे पहली कविता नदी की काफी सराहना की-

ग़म ये नहीं कि, नदी, सागर से मिलती है,

गम ये है कि नदी सागर में गिरती है

कैसा छलावा दिया भोली नदिया को

ऐ सागर तूने,

मिलन की आस, दोनों में है

पर पतन, नदी ही सहती है ।

डॉ. विवेक गौतम के संचालन में सम्‍पन्‍न समारोह में लेखिका का परिचय आकाशवाणी की श्रीमती चंद्रिका जोशी ने प्रस्‍तुत किया जबकि धन्‍यवाद ज्ञापन श्री दुर्ग विजय सिंह ने किया ।

Jan 7, 2011

अंतस का संगीत- काव्य संग्रह




कृति : अंतस का संगीत
विधा : दोहे एवं गीत
रचनाकार : अंसार क़म्बरी
प्रकाशक : नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली

वितरक : शिल्पायन, दिल्ली
मूल्य : रु 150/-

जब रात होती है तो कोई अंधेरा देखता है, कोई आसमान की तरफ़ खिड़की खोल लेता है, कोई आसमान में फैले हुए असंख्य तारे देखता है, कोई उनमें से ढूँढ के ध्रुव तारा भी देख लेता है, जो सारे तारों से अलग खड़ा है……पर जो विराट आसमान में असंख्य तारों के बीच, दूर खड़े ध्रुव तारे का आसमान में दूर होते जाना, उसका निष्कासित किया जाना देख लेता है, जो उसकी चमक के उत्सव में भी उसके आसमान से निष्कासन का दुख देख लेता है, वह सच्चा कवि होता है। वह सदियों पुराने दर्दों को महसूस करता है, उन्हें जीता है। ख़ुद धागा बनके उन्हें अपने में पिरोता है। अपने दुख-दर्द दबाकर दूसरों के ज़ख्मों पर मरहम रखता है, उन पर आँसू बहाता है। उन्हें गीतों में, ग़ज़लों में, दोहों में ढालता है। वह आँखों में सूखती नमी को पालता है, सहेजता है और चुपके से संस्कृति और साहित्य की ज़मीन तैयार करके, उसमें उस नमी को बो देता है, जिससे सदियों तक आने वाली पीढियाँ मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं के पेड़ों को बोते, रोपते और सींचते कटी है अंसार क़म्बरी की ज़िन्दगी। उन्होंने दर्द के मौसमों में कबीर की तरह उत्सव मनाया है, तो संत दादू की तरह झूठी चकाचौंध के बीच सिसकती पीर को पढ़ा है। आज यहाँ हर चीज़ बाज़ार में बिकने के लिए खड़ी है, हमारे चारों तरफ़ दुकानें सजी हैं, शुक्र है कि हमारे बीच एक अंसार क़म्बरी हैं।

- विवेक मिश्र -
www.vivechna.blogspot.com





Nov 20, 2010

संदेश की कविता - त्रिधा














पुस्तक नाम - 'त्रिधा'
विधा - कविता संग्रह
रचनाकार - डॉ. अनामिका रिछारिया
प्रकाशक - जे.एम.डी पब्लिकेशन, दिल्ली
पुस्तक समीक्षक - दिनेश बैस, 3 गुरूद्वारा, नगरा, झांसी - 284003 (0510-2311015/0800-4271503)
प्रति सम्पर्क - डॉ. अनामिका रिछारिया, B-3/4, तालपुरा योजना, आवास विकास, कानपुर रोड, झांसी(उ.प्र)


आश्चर्य होता है कि स्प्रिट, क्लोरोफार्म की उबकाई पैदा करने वाली गंध में रची-बसी, ख़ून-मवाद, बास मारते घावों का दिन रात सान्निध्य और

"जल रहा है शहर, आग क्यों दिखती नहीं,
मन सुलगते हैं और धुआं क्यों उठता नहीं"

जैसी संवेदनशील पंक्तियां लिखना। एक डॉक्टर के साथ कवियित्री बन जाने की दुर्घटना कैसे हो गई। लेकिन विश्वदि व्याकरणाचार्य स्व.पंडित कामता प्रसाद की पौत्री तथा स्वनाम धन्य भाषाविद् डॉ. राजेश्वर गुरू की पुत्री डॉ. अनामिका रिछारिया को साहित्यिक जीन्स संस्कार से ही मिले थे। उन्हें साहित्यकार ही बनना था। डॉक्टर बनना एक संयोग हो सकता था। यह जन्मना संस्कार इतने प्रबल थे कि बाद में झांसी के प्रमुख राजनैतिक परिवार में व्याहने के बाद राजनैतिक परिवेश भी उन्हें संक्रमित नहीं कर पाया। पेशे से वे डॉक्टर रहीं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका तक का दायित्व सम्भाला। कर्म से कहानी-कविता-चित्रकला में स्वयं को आज़माती रहीं।

'त्रिधा' डॉ. अनामिका रिछारिया का संग्रह नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं-रेडिओ पर दस्तक देने के साथ-साथ पूर्व में भी उनके कथा और काव्य संग्रह आ चुके हैं।

अन्ठान्वे कवितायें डॉ. अनामिका के संग्रह 'त्रिधा' में संग्रहित हैं। उनकी रचनाओं में मुक्त प्रवाह है। विषय विशेष के प्रति वे बाध्य नहीं हैं। उनकी कविताओं में बचपन की किलकारी है तो यौवन की अतृप्त प्यास भी है और आनेवाली पीढ़ी के प्रति संवेदनशील विश्वास भी है। उनके विभिन्न शेड्स देखिए -

'बोल दिया अंशु ने रेडी/ढूढ़ रहे अंशु को डैडी/ढूढ़ लिया बिस्तर के नीचे/
ढूढ़ा अल्मारी के पीछे/ ढूढ़ लिया है बाग़-बग़ीचे/ छुपी हुई थी अंशु रानी, मम्मी के पलकों के पीछे'

'तुम मेरे सपने हो/ पर तुम्हारा मौन मुझे तुम तक पहुँचने नहीं देता'

'दिल का कोना ख़ाली है, दर्द वहीं पर होता है,
देता है आशीष तुम्हें, पर मन चुपके से रोता है'

डॉ. अनामिका रिछारिया की रचनाओं में निराशा-हताशा कम ही मिलती है। उनमें उर्जा का स्तर बहुत ऊँचा है। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चलती हैं वे -

'चाहती हूँ बनना शिखा दीप की/ या मोती बनूं विश्व की दीप की
रूढ़िओं के तम को हटाती चलूं/ नई उमंगें मन में जगाती चलूँ'

डॉ. अनामिका रिछारिया ने बहुत हल्के-फुल्के मूड की कवितायें भी लिखी हैं -

'सासू ऐसी चाहिये, जैसा सूप सुभाय
दहेज-दहेज तो रख लहे, बहू को देहि जलाए'
या
'पैसा इतना खाइये, जितना लेय पचाय,
बीवी हार में ख़ुश रहे, छापा न पड़ पाये'

'अर्ज़ी लिख-लिख जग मुआ, अर्ज़ी पढ़े न कोय
ढाई दिना हड़ताल की करे, सो कारज होय'

सामाजिक सरोकारों से अनामिका रिछारिया मनोयोग से जुड़ी हैं। कविता लिखना उनके लिए कला प्रदर्शन नहीं है बल्कि संदेश पहुँचाने का माध्यम है। शायद यही कारण है कि उनकी रचनाओं में पॉलीथिन, स्त्री शिक्षा, दहेज दमन, कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण संरक्षण, जन संरक्षण, पोलिओ उन्मूलन, परिवार नियोजन, एड्स, टीकाकरण जैसे विषयों पर भी सरल-सहज और कभी-कभी स्लोगन के स्तर पर भी कवितायें मिलती हैं।

डॉ. अनामिका रिछारिया कहानियाँ भी लिखती हैं। बुन्देली परिवेश में पनपी उनकी कुछ कहानियाँ तो बेहद संवेदनशील हैं। मुझे लगता है कि कहानियों में वे अपने आपको ज़्यादा बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाती हैं।

- दिनेश बैस -

www.vivechna.blogspot.com