Showing posts with label review. Show all posts
Showing posts with label review. Show all posts

Nov 20, 2010

संदेश की कविता - त्रिधा














पुस्तक नाम - 'त्रिधा'
विधा - कविता संग्रह
रचनाकार - डॉ. अनामिका रिछारिया
प्रकाशक - जे.एम.डी पब्लिकेशन, दिल्ली
पुस्तक समीक्षक - दिनेश बैस, 3 गुरूद्वारा, नगरा, झांसी - 284003 (0510-2311015/0800-4271503)
प्रति सम्पर्क - डॉ. अनामिका रिछारिया, B-3/4, तालपुरा योजना, आवास विकास, कानपुर रोड, झांसी(उ.प्र)


आश्चर्य होता है कि स्प्रिट, क्लोरोफार्म की उबकाई पैदा करने वाली गंध में रची-बसी, ख़ून-मवाद, बास मारते घावों का दिन रात सान्निध्य और

"जल रहा है शहर, आग क्यों दिखती नहीं,
मन सुलगते हैं और धुआं क्यों उठता नहीं"

जैसी संवेदनशील पंक्तियां लिखना। एक डॉक्टर के साथ कवियित्री बन जाने की दुर्घटना कैसे हो गई। लेकिन विश्वदि व्याकरणाचार्य स्व.पंडित कामता प्रसाद की पौत्री तथा स्वनाम धन्य भाषाविद् डॉ. राजेश्वर गुरू की पुत्री डॉ. अनामिका रिछारिया को साहित्यिक जीन्स संस्कार से ही मिले थे। उन्हें साहित्यकार ही बनना था। डॉक्टर बनना एक संयोग हो सकता था। यह जन्मना संस्कार इतने प्रबल थे कि बाद में झांसी के प्रमुख राजनैतिक परिवार में व्याहने के बाद राजनैतिक परिवेश भी उन्हें संक्रमित नहीं कर पाया। पेशे से वे डॉक्टर रहीं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका तक का दायित्व सम्भाला। कर्म से कहानी-कविता-चित्रकला में स्वयं को आज़माती रहीं।

'त्रिधा' डॉ. अनामिका रिछारिया का संग्रह नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं-रेडिओ पर दस्तक देने के साथ-साथ पूर्व में भी उनके कथा और काव्य संग्रह आ चुके हैं।

अन्ठान्वे कवितायें डॉ. अनामिका के संग्रह 'त्रिधा' में संग्रहित हैं। उनकी रचनाओं में मुक्त प्रवाह है। विषय विशेष के प्रति वे बाध्य नहीं हैं। उनकी कविताओं में बचपन की किलकारी है तो यौवन की अतृप्त प्यास भी है और आनेवाली पीढ़ी के प्रति संवेदनशील विश्वास भी है। उनके विभिन्न शेड्स देखिए -

'बोल दिया अंशु ने रेडी/ढूढ़ रहे अंशु को डैडी/ढूढ़ लिया बिस्तर के नीचे/
ढूढ़ा अल्मारी के पीछे/ ढूढ़ लिया है बाग़-बग़ीचे/ छुपी हुई थी अंशु रानी, मम्मी के पलकों के पीछे'

'तुम मेरे सपने हो/ पर तुम्हारा मौन मुझे तुम तक पहुँचने नहीं देता'

'दिल का कोना ख़ाली है, दर्द वहीं पर होता है,
देता है आशीष तुम्हें, पर मन चुपके से रोता है'

डॉ. अनामिका रिछारिया की रचनाओं में निराशा-हताशा कम ही मिलती है। उनमें उर्जा का स्तर बहुत ऊँचा है। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चलती हैं वे -

'चाहती हूँ बनना शिखा दीप की/ या मोती बनूं विश्व की दीप की
रूढ़िओं के तम को हटाती चलूं/ नई उमंगें मन में जगाती चलूँ'

डॉ. अनामिका रिछारिया ने बहुत हल्के-फुल्के मूड की कवितायें भी लिखी हैं -

'सासू ऐसी चाहिये, जैसा सूप सुभाय
दहेज-दहेज तो रख लहे, बहू को देहि जलाए'
या
'पैसा इतना खाइये, जितना लेय पचाय,
बीवी हार में ख़ुश रहे, छापा न पड़ पाये'

'अर्ज़ी लिख-लिख जग मुआ, अर्ज़ी पढ़े न कोय
ढाई दिना हड़ताल की करे, सो कारज होय'

सामाजिक सरोकारों से अनामिका रिछारिया मनोयोग से जुड़ी हैं। कविता लिखना उनके लिए कला प्रदर्शन नहीं है बल्कि संदेश पहुँचाने का माध्यम है। शायद यही कारण है कि उनकी रचनाओं में पॉलीथिन, स्त्री शिक्षा, दहेज दमन, कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण संरक्षण, जन संरक्षण, पोलिओ उन्मूलन, परिवार नियोजन, एड्स, टीकाकरण जैसे विषयों पर भी सरल-सहज और कभी-कभी स्लोगन के स्तर पर भी कवितायें मिलती हैं।

डॉ. अनामिका रिछारिया कहानियाँ भी लिखती हैं। बुन्देली परिवेश में पनपी उनकी कुछ कहानियाँ तो बेहद संवेदनशील हैं। मुझे लगता है कि कहानियों में वे अपने आपको ज़्यादा बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाती हैं।

- दिनेश बैस -

www.vivechna.blogspot.com

Nov 12, 2010

पुस्तक-समीक्षादस्तावेजी महाकाव्य : सत्तावनी श्रध्दांजलि


कृति : सत्तावनी श्रध्दांजलि
विधा : महाकाव्य
रचनाकार : डॉ. गुरु प्रसाद ‘शुभेश’ भट्ट
सम्पादक : डॉ. ए.के.पाण्डेय
प्रकाशक : राजकीय संग्रहालय, झाँसी
मूल्य : रु 75/-
पृष्ठ : 124

डॉ. गुरु प्रसाद शुभेश प्रवृत्ति और पेशे से चित्रकार हैं। अन्वेषी स्वभाव के कारण संभवत: उन्होंने चित्रकला में डॉक्टरेट किया है। सन् 1957 में उन्होंने कला शिक्षक के रूप में चित्रकला का शिक्षण प्रारंभ किया, जो अनवरत् झाँसी के ऐतिहासिक विद्यालय, ‘बिपिन बिहारी इण्टरकॉलेज’ से जून 1994 में सेवानिवृति तक चलता रहा। वैसे वे स्वयं में कला शिक्षण संस्थान रहे हैं। चित्रकला शिक्षण को समर्पित लगभग तीस संस्थाओं के संस्थापक डॉ. शुभेश रहे हैं। आज झाँसी के अस्सी प्रतिशत से अधिक स्थापित तथा प्रयासरत चित्रकारों ने डॉ. शुभेश से किसी न किसी प्रकार कुछ न कुछ सीखा है। झाँसी रेलवे स्टेशन सहित देश के तमाम सरकारी-ग़ैर सरकारी संस्थानों में डॉ. शुभेश की पेंटिंग्स सज्जित हैं।हिन्दी, अंग्रेजी, अवधी, बुन्देली भाषाओं/बोलियों में पारंगत डॉ. शुभेश एक महाकवि होने की हैसियत भी रखते हैं, यह उनकी काव्य-पुस्तक ‘सत्तावनी श्रद्वांजलि प्रकाशित होने पर ही जान सके।झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरित गायकों का सिलसिला संभवत: स्वर्गीया सुभद्रा कुमारी चौहान से भी पहले से आज तक चला आ रहा है। लेकिन डॉ. शुभेश इस सिलसिले की कड़ी नहीं हैं। वे इसलिए स्वयं में मौलिक हैं कि उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने रानी झाँसी को अति मानवी मानने से इनक़ार किया है। गहन शोध और घटनाओं की तार्किकता के आधार पर उन्होंने बजबजाती भावुकता से हट कर स्त्री-शक्ति के सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में रानी को सत्तावनी श्रध्दांजलि में प्रतिष्ठित किया है।महाकाव्य के संपादक डॉ. ए के पाण्डेय के शब्दों में कहें तो ‘यह काव्यमय श्रध्दांजलि, छिपे इतिहास को सामान्य पाठकों तक लाने का प्रयास है।’जहाँ तक छिपे इतिहास को खोजने का प्रश्न है तो इस संबंध में डॉ. शुभेश की समझ है-जीवन-विकास का प्रकाश कहीं से आप,आने दो, उस जैसा उज्ज्वल भविष्य का तूर्ण कहाँ?उनकी तिलमिलाहट यह है कि उनके शहर के लोग जानकारियों को गुप्त रखने विश्वास करते हैं। उन्हें बाहर नहीं आने देना चाहते हैं। ज़्यादातर प्रकरणों में तो भ्रामक सूचनाएँ देते हैं-सूचना ग़लत देत बुध्दि मन मथ देतयह स्थिति तथ्यों को कहीं गहरे दफ्न कर देती है। मिथकों को इतिहास की तरह स्थापित कर देती हैं। लेकिन डॉ. शुभेश ने ऐसी तर्कहीन जानकारियों/मिथकों को मानने से इनक़ार किया है। चाहे वह रानी के दामोदर राव को पीठ पर बांध कर क़िले से छलांग लगाने का प्रसंग हो या वीर रस की झोंक में पत्थर के स्तम्भ को तलवार से काटने की बात हो। ऐसी कनबतियों को डॉ. शुभेश ने ललकारा है। रानी के इतिहास को विज्ञान सम्मत बनाने के लिए कहा है-‘रानीकूदी’ थीं किला से कुदवान कोउ, पीठि बांधिकूद कर कबहू दिखावै कोउ?महल-खम्भ काटिबे को, कोऊ बनैना वारपूरे फल-धार की तरवारि तो बतावै कोउ॥पत्थर कटत नैइयाँ, टूटत सुधैयाँन सूधतिरछी तरवारि मारि, काटि कै दिखावै कोउ?जे उपहास बिन्दु, इनको मिटाव अब,इन्दु-यश रानी को, वैज्ञानिक बनाव कोउ!पुस्तक के अधिकांश द्वन्द बुन्देली में लिखे हैं लेकिन अभिव्यक्ति में भाषा आग्रह नहीं है। इसके लिए ‘इल्ट्रॉयड’, ‘बाइ-सेप्स’, ‘स्केपुना’ जैसे अंग्रेजी के तकनीकी शब्द आते हैं तो उनका भी बुन्देली छन्दों में स्वागत हुआ है।महाकाव्य को लेकर डॉ. शुभेश कितने गंभीर रहे हैं, कितना परिश्रम किया है उन्होंने, यह समझने के लिए उनका आत्मकथ्य (कुछ इधर की, कुछ उधर की) पढ़ना अपने-आप में रोचक है।पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए मूल काव्य के अलावा पाँच खण्डों में बाँटा गया है। इनमें ‘झाँसी का मानचित्र’, ‘मानचित्र-परिचय’, ‘झाँसी राज्य पर अमलदारी का काल-विभाजन’, ‘संदर्भ’, ‘किले का रेखांकन (डॉ. शुभेश द्वारा चित्रांकित) मय परिचय के सहित नौ परिशिष्ट समाहित हैं।जबकि छंदबध्द रानी चरित् को ‘मंगल-आचरण’, ‘प्रभाव’, ‘प्रवाह’, ‘झाँसी-झलक’, ‘राज्याभिषेक’, ‘कुँवर सागर सिंह’, ‘मेला में झमेला’, ‘सैन्य-अभियान’, ‘झाँसी का किला-परिचय’, ‘बारह द्वार’, ‘बारह उपद्वार’, ‘सावधान’, ‘तैयारी’, ‘युध्द’, ‘पटल परिवर्तन’, ‘सर्व वै पूर्णयज्ञं स्वाहा’, ‘ग्वालियर’, ‘पुन: झाँसीपुरी’, ‘श्रध्दांजलि’ शीर्षकों में विभाजित किया गया है।मुझे लगता है कि यह पुस्तक अगर गद्य में लिखी जाती तो इसकी ‘अप्रोच’ ज्यादा व्यापक क्षेत्र तक हो सकती थी। जैसी कि डॉ. शुभेश की ही अंग्रेजी में लिखी एक अन्य पुस्तक ‘देवगढ़ एन अन-अर्थली प्लेज़र’ है।छंव, वह भी बुंदेली भाषा में आम पाठकों को पुस्तक से विरत् कर सकते हैं। हालाँकि डॉ. शुभेश ने बुन्देली के अप्रचलित शब्दों के अर्थ संदर्भ में दिए है लेकिन इनकी संख्या इतनी अधिक है कि लगातार पढ़ने का क्रम भंग होता रहता है। इतिहास या विज्ञान का पाठक तो इस क्रम-भंग का आदी होता है, सामान्य पाठक नहीं।यह सोचकर ही सिहरन होने लगती है कि कुल 203 छंदों के लिए 2031 संदर्भ-बिन्दु दिए गए हैं। संभवत: अंतिम दो छन्द ही ऐसे हैं जिन्हें संदर्भ से मुक्ति मिली है।

-दिनेश बैस-




Sep 25, 2010

पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य

पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य - विवेक मिश्र
http://www.vivechna.blogspot.com/










किताब - शिक्षा का कर्म-साहित्य का मर्म- डॉ अरुण प्रकाश ढौंडियाल
संपादक - डॉ विवेक गौतम



डॉ अरुण प्रकाश ढौंडियाल जी को मैं उनसे साक्षात् मिलने के पहले से ही उनकी कहानियों के माध्यम से जानता था, पर जब मैं उनसे मिला, मैंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से जाना तो पाया कि एक विद्वान शिक्षाविद्, कुशल प्रकाशक के साथ-साथ वह बहुत गहरी संवेदनाओं के कवि भी हैं। उस कवि के भीतर ही, अपनी कुशल प्रकाशक की छवि से इतर, बड़े जतन से उन्होंने पहाड़ी संस्कृति और प्रेम से लबालब हृदय वाले इंसान को संजो कर रखा है। वह इंसान जो दूसरों की तकलीफ़ में मीलों चल सकता है। वह इंसान जो इस महानगर की आपा-धापी में भी अपना काम छोड़कर दूसरों की मदद में जुट सकता है।
वे सहज ही अपने स्वभाव से एक किस्सागो हैं। वह जो कुछ सुनाते, लगता यह तो एक नई कहानी का प्लॉट है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि एक कवि-कहानीकार के रूप में उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उससे कहीं ज़्यादा अभी भी उनके मन में है, उनकी स्मृतियों में है, जिसको अभी पन्नों पर उतरना बाक़ी है।
उनके भीतर के कहानीकार की प्रतिभा अन्य समकालीन आंचलिक कहानीकारों से अलग है। वह बहुत सहज, सरल रहते हुए भी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थियों पर पैनी नज़र रखते हैं। वह उम्र के छ: दशक पार करने के बाद भी, उस माटी से, उस परिवेश से जुड़े हैं जहाँ उनका जन्म और पालन-पोषण हुआ। आज भी पहाड़, उसकी संस्कृति, वहाँ के समस्त क्रियाकलाप, जीवन की ऊहा-पोह, उसके संघर्ष और साथ-साथ वहाँ की प्राकृतिक छटा, वहाँ का सौन्दर्य, वहाँ के निवासियों का प्रेम एवं वात्सल्य, उसकी निश्छलता उनके मन-मस्तिष्क में, उनके व्यक्तित्व में पूरी ताज़गी के साथ उपस्थित है। उनकी कहानियों में यदि पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों का लेखा-जोखा है, तो वहाँ के आनंद और उत्सव का भी ज़िक्र है। वे विस्थापन के दर्द को समझते हैं और अपनी कहानियों में बहुत धीरे-से संबंधों के टूटने की कसक को पिरोते है। डॉ ढौंडियाल ने भले ही पहाड़ छोड़ दिया हो, पर वह पूरे आयतन और भार के साथ उनमें बसा हुआ है, जैसे चंदन की शाख़ पेड़ से कट कर भी उसकी ख़ुशबू हमेशा अपने साथ रखती है, वैसे ही उनमें, उनकी आँखों में पहाड़ की संस्कृति, उसका भोलापन सजा रहता है, जो उनसे मिलने पर महक उठता है। ……… चमक उठता और धीरे-धीरे प्रेम का अरुणोदय होने लगता है उसका प्रकाश फैलने लगता है। इस प्रकाश की चमक बढ़ती रहे। उसकी किरणों का सान्निध्य सदा बना रहे, इसी कामना के साथ।

-विवेक मिश्र-




Sep 17, 2010

गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ -'आज का दुर्वासा' कहानी संग्रह


गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ हैं सन्तोष खन्ना के कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' में।
समीक्षक - विवेक मिश्र

www.vivechna.blogspot.com






कृति - आज का दुर्वासा
विधा - कहानी
कहानीकार- सन्तोष खन्ना
प्रकाशक - भारत ज्योति प्रकाशन
मूल्य - रू 250/-

हिन्दी कहानी पूरी सदी का सफ़र तय कर चुकी है। अक्सर ही कहानी को लेकर सामाजिक बदलावों और नई क्रान्तियों की घोषणा भी की जाती है, लेकिन कईयों बार इस पर सवाल भी उठे हैं और इसे कटघरे में भी खड़ा किया जाता रहा है। अपने भीतर-बाहर तमाम सवालों के जवाब ढूँढती, आगे बढ़ती हिन्दी कहानी का स्वरूप बदलता रहा है। आधुनिक हिन्दी कहानियों पर रूसी कहानियों का गहरा असर दिखाई देता है, जिसमें उसकी अच्छाईयाँ और बुराईयाँ बराबर से घुली-मिली दिखाई देती है। परन्तु अस्सी और नब्बे के दशक में कई कहानीकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने इस प्रभाव को पीछे छोड़ते हुए अपने ही अन्दाज़ में अपने पूरे देसीपन के साथ कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियाँ वास्तविक भारतीय जीवन के बहुत निकट हैं और उसकी प्रस्तुति भी कहानी की घटनाओं के अनुरूप है। इनमें देसी बात विदेशी ढंग से या उधार के शिल्प में ढालकर कहने की सनक नहीं है। ऐसी ही एक लेखिका हैं सन्तोष खन्ना, जो कवयित्री और संपादिका तो हैं ही, अपने समय की श्रेष्ठ कहानीकार भी हैं।

सन् 2009 में सन्तोष खन्ना का कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी लगभग अट्ठारह छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं। संकलन की पहली कहानी 'आज का दुर्वासा' आज के समय की, समाज की तमाम पर्तें उघाड़ती एक बेबाक कहानी है, जो आज के समय को नंगा करके, हमारे प्रगति के सारे दावों की पोल खोल के रख देती है। इस कहानी को पढ़ते हुए उदय प्रकाश की 'तिरिछ' याद आ जाती है। 'तिरिछ' में शहर की निर्ममता का शिकार एक भोला-भाला ग्रामीण है, पर यहाँ यह सब कुछ शहर में रहने वाले, एक ऐसे व्यक्ति के साथ बीता है, जिसका जीवन शहर में ही बीता है, पर फिर भी यह शहर, यह तन्त्र उसके लिए एक निष्ठुर और विकराल पिशाच सिद्ध होता है, जो उससे उसका नाम, घर, सम्मान, उसकी अस्मिता सब कुछ छीन लेता है, यहाँ तक कि उसकी बुद्धि, विवेक भी। सब कुछ खो चुकने के बाद भी एक बात जो उसके चरित्र में शेष रह जाती है, वह है उसका आक्रोश और वही उसे आज का दुर्वासा बना देता है। कहानी का अन्तिम वाक्य महानगरों में बसे पूरे संवेदनाहीन समाज को दिया गया उस आदमी का श्राप है, जिससे इस शहर ने उसका सब कुछ छीन लिया है। वह कहता है "तुम्हारे बच्चे तुम्हें पहचानना भूल जाएँ……"।

सन्तोष खन्ना की कहानियाँ हमारे आस-पास के जीवन में बिखरे तमाम रंगों को समेटती हैं, इसमें इतिहास, वर्तमान और कहीं-कहीं भविष्य की झाँकिया भी देखने को मिलती हैं। वह प्लॉट को बड़े सरल ढग से शुरू करके, बड़ी सहजता से बुनती हैं। कहानियाँ पढ़ते वक़्त लगता है हम कहानियाँ देख रहे हैं। पात्र आपस में ही नहीं बल्कि पाठक से भी संवाद कर रहे हैं। ऐसी ही एक कहानी है 'नास्तिक' जिसमें बड़ी सहजता से धर्म और अध्यात्म जैसे जटिल विषय की गूढ़ गुत्थियों को कहानीकार ने एक छोटी-सी कहानी में बड़े निर्दोष ढंग से सुलझाया है। अच्छी बात यह है कि कहानीकार स्वंय उपदेशक नहीं है। वह स्वंय पाठक के साथ अपनी समस्याओं से जूझ रहा है। वह स्वंय भी कई अनसुलझे सवालों के झुरमुट में खड़ा है, और यही बात सन्तोष खन्ना को अन्य कहानीकारों से अलग करती है।

'पंसेरी' संग्रह की एक और छोटी कहानी है, जो स्त्री शोषण की व्यथा को एवं समाज द्वारा स्त्री को वस्तु के रूप में देखे जाने की वृत्ति को दर्शाती है।

'प्रायश्चित' कहानी में संतोष ने कथा की एक नई दहलीज़ बनाई है। वह कथा के विराट विस्तार को अपने में समेटे हुए है, जिसकी अलग से चर्चा की जानी चाहिए।

'बेबसी', 'साझेदारी', 'बिना टिकिट' और बूट पालिश संग्रह की अन्य अच्छी कहानियाँ हैं।

सन्तोष खन्ना की हरेक कहानी गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानी है। हरेक कहानी सरल ढंग से कही गई परन्तु गहन संवेदनाओं और जटिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करती, मानवीय मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करती है। संग्रह की कहानियाँ स्वतंत्र रूप से एवं विस्तार से एक साहित्यिक चर्चा की माँग करती हैं। अवसर एवं मंच मिलने पर ऐसा अवश्य संभव होगा। कहानियों के भीतर छुपी लेखिका की संवेदनाएँ पाठक के भीतर गहरे में अपनी पैंठ बनाने और अपनी छाप छोड़ने में सफ़ल होंगी, इसी विश्वास के साथ। सन्तोष जी को संग्रह के लिए शुभकामनाएँ।

- विवेक मिश्र -
मोब: 9810853128

Aug 20, 2010

ग़लत समय पर प्रकाशित सही कविताएँ














कृति- अतीत के प्रेत
विधा- कविता
कवि- जगदीश सविता
प्रकाशन- सारांश प्रकाशन
मूल्य- रु 100

‘अतीत के प्रेत’ जगदीश सविता जी का एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें पौराणिक और मिथकीय पात्रों-चरित्रों और घटनाओं के माध्यम से कवि हमारी संस्कृति की जड़ों में बैठे ढकोसलों की बड़ी बारीक़ी से पड़ताल करता है। वह सदियों से महिमा-मंडित किए जाते रहे देवतुल्य या स्वयं अवतार कहे जाने वाले चरित्रों की भी पोल खोलता है, उनसे सवाल करता है और उनकी दिव्यता को, उनके अस्तित्व को कठघरे में खड़ा करता है। वह पुराणों और मिथकों में से ही ऐसे चरित्र, ऐसी घटनाएँ ढूंढ लाता है, जो गवाह हैं इस बात की, कि कमज़ोर का शोषण हर हाल में, इस काल में होता रहा है, होता रहेगा। इससे छुटकारा तभी संभव है जब हम अपनी ऑंखों से अंधविश्वास की पट्टी हटाएँ, अपने विवेक को जागृत करें, हर वर्ग का, हर व्यक्ति शिक्षित हो, ताकि सुनी-सुनाई मन-गढ़न्त बातें उसके जीवन का मार्ग निर्धारित न करें। वह अपना सत्य स्वयं खोजे, उसे जाँचे-परखे, चाहे उसे हज़ारों-लाखों बार गिरना पड़े, मुँह की खानी पड़े।

…पात्र हैं महाभारत के
एक से बढ़कर एक
लम्पट शान्तनु
कुण्ठाओं का गट्ठड़ भीष्म
भाड़े का टट्टू द्रोण
और निरीह शिशुओं का हत्यारा
उसका कुलदीपक
दूरदर्शी संजय
अंधा धृतराष्ट्र
फूट चुकी हैं जिसकी
हिय की भी!
….और पहलवान भीम
नपुंसक धनुर्धारी
और उसकी गाड़ी खींच ले जाने वाला
छलिया कृष्ण
जिसे भगवान मानने में ही ख़ैर
ये सभी
मानो चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हों
”हम आज भी हैं
महाभारत कभी ख़त्म नहीं होता”

कवि इन मिथकों में, पुराणों में सच्चा इतिहास ढूंढता है और हताश होकर मात्र कविता में, या कल्पना में थोड़ा-बहुत सत्य बचे रह जाने से ही संतोष करता है, पर साथ ही झूठ के पुलिंदों से दूर रहने को आगाह भी करता है-

‘लाश घर’ है इतिहास
एक एल्बम है जिसमें
महलों के
षडयंत्रों के
युध्द के मैदानों के
कहाँ है प्राणवन्ता?
रंग… रूप… रस?
कहाँ हैं धड़कनें?
आहें?
वह तो भला हो कल्पना का।

वाक़ई इतिहास में ज़िक्र है राजाओं का, रानियों का, देवों का, अवतारों का, युध्दों का, पर कहाँ गई वो युध्द में हताहत हुए सैनिकों की सूची? कहाँ गई उन स्त्रियों की, बच्चों की चीखें, कहाँ गया उन लाखों-करोड़ों मनुष्यों के रक्त का हिसाब, जो कट गए किसी एक व्यक्ति के स्वार्थ के लिए,किसी एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए। क्यों उनके लिए नहीं चला सुदर्शन चक्रद्व क्यों उनकी रक्षा के लिए नहीं अस्त हुआ समय से पूर्व सूरजद्व क्यों नहीं शहीद हो गए मुस्कुराते हुए महानायक युध्द में-

यदि तुम चाहते तो
रुक सकता था महासमर!
तुम्हें तो मालूम था योगिराज!
विषाद ही तो है
योग के सोपान का प्रथम पायदान
आत्मग्लानि में डूबा
द्रवितमना अर्जुन
क्या ज़रूरत थी
उस सत्रह अध्याय लम्बे वाग्जाल की?
…बच सकते थे अठारह अक्षौहिणी जीवन
यदि तुम चाहते तो!

जगदीश सविता जी की कविताएँ उस समय की कविताएँ हैं जब आज़ादी के बाद लोग सकारात्मक बदलाव के सपने देख रहे थे। कविता छन्दों से निकल कर मुक्त हो रही, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को आम आदमी के शब्दों में कहा जा रहा था। यूँ कहें कि नई कविता की नींव पड़ रही थी, जब मुक्तिबोध को, उनकी कविताओं को बहुत बड़ा कवि वर्ग नकार रहा था और वहीं-कहीं मुक्तिबोध के लिए, उनकी कविता के लिए ज़मीन तैयार हो रही थी-

क्या दिन थे वे भी…
रोज़ तीन टांग वाले स्टोव पर
वह मेरा चाय बनाना
गली के काणे कुत्ते का
हिज़ मास्टर्स वाइस के पोज़ में
आ बैठना…
…कई एकड़ में फैली
नवाब साहब की हवेली में
खुलेगा
एक दिन ज़रूर खुलेगा
कम्यूनिस्ट पार्टी का दफ्तर
लहराएगा लाल परचम
…हाँ तो पहलवान
देना एक बीड़ी
माचिस है मेरे पास
…..क्या दिन थे!

कवि बुरे हालातों में भी एक मस्त कलन्दर की ज़िन्दगी जीता है, घोर निराशा के क्षणों में भी उम्मीद रखता है, लाल परचम लहराने की। साधनहीन खड़ा है पर बेबाक़ी से मांग सकता है, छीन सकता है साधन क्रांति के….. क्योंकि ‘माचिस है उसके पास’।
सच ही है। जगदीश सविता की कविताएँ चिंगारियाँ हैं, जो सीनों में दबे बारूदों को धमाकों में बदल सकती हैं। पर अफ़सोस कि ये कविताएँ ऐसे समय में सामने आ रही हैं जब सारी पार्टियों के चेहरे से नक़ाब उतर चुके हैं। क्रान्तियों की दिशा बदल चुकी है। युवाओं का आन्दोलन वंचितों का आन्दोलन एक अंधी हिंसक लड़ाई में तब्दील हो गया है। ऐसे मैं इन कविताओं को पूरे एहतियात के साथ, उस समय से जोड़ कर पढ़ा जाना चाहिए, जिस समय में ये लिखी गई थीं।
जगदीश सविता जी के पाँच काव्य-संग्रह हिन्दी में तथा एक काव्य संग्रह अंग्रेजी में प्रकाशनाधीन है।

-विवेक मिश्र-

Aug 18, 2010

'अमिट ह्स्ताक्षर' - पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर









'अमिट ह्स्ताक्षर' - पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर जी के द्वारा लिए गए छायाचित्रों के माध्यम से, एक बीते युग का सफ़र है।


'अमिट हस्ताक्षर' वीरेन्द्र प्रभाकर जी के लम्बे फ़ोटोग्राफ़ी के कैरियर में लिए गए उन दुर्लभ चित्रों की झाँकी है, जिनमें देश का पिछले पचास सालों में बदलता चेहरा सामने आता है। संग्रह में वीरेन्द्र प्रभाकर जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते कई लेख भी हैं।
प्रकाशन की दृष्टि से इतने सारे चित्रों को इतने वर्षों तक संजोकर के रखना और उन्हें संयोजित कर पुस्तक का रूप देना सचमुच ही सराहनीय कार्य है। पुस्तक में चित्रों के माध्यम से आज़ादी के पहले गाँधी जी के समय से लेकर आजतक के आधुनिक भारत की तस्वीरें हैं।
चित्रों के चयन एवं संपादन में व्यक्तियों को अधिक महत्व दिया गया है। संग्रह में आम आदमी के, दर्शनीय स्थलों के एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के चित्रों का सर्वत्र अभाव है। ऐसा नहीं कि साठ सालों के सफ़र में वीरेन्द्र जी के कैमरे की आँख को सत्ता के गलियारों से बाहर झाँक कर गाँव में बसे असली भारत को देखने का मौक़ा न मिला हो, पर संग्रह में कैमरे की आँख सत्ता के गलियारों में ही भटकती रहती है, इसीलिए संग्रह में उन्हीं लोगों के चित्रों की अधिकता दिखाई देती है जो लम्बे समय तक सत्ता में या इसके आस-पास रहकर ही देश की सेवा करते रहे हैं। कुछ चित्रों का रेसोल्युशन कम है जो छपने पर बदरंग लगते हैं, उन्हें प्रकाशन से पहले ठीक किया जाना चाहिए था।
संग्रह में संग्रहीत चित्र प्रभावित तो करते हैं, परन्तु कहीं न कहीं भारत की भव्यता को प्रदर्शित करते हुए उसकी आत्मा को छूने में चूक जाते हैं।

- विवेक मिश्र -