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Jan 7, 2011

कमलेश्वर के कथा-साहित्य में स्त्री-विमर्श - एक शोध



  • कृति - कमलेश्वर के कथा-साहित्य में स्त्री-विमर्श
  • विधा - शोध
  • लेखिका - डॉ. करुणा शर्मा
  • प्रकाशक - नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली
  • प्रमुख वितरक - शिल्पायन, दिल्ली
  • मूल्य - रू 550/-

हिन्दी कथा साहित्य एक पूरी सदी से भी अधिक का सफ़र तय कर चुका है। इसमें प्रारम्भ से लेकर आज तक अनेक बदलाव आये, अनेक प्रकार के आन्दोलन हुए, अनेक प्रश्न भी उठे और अनेक बार इसे कटघरों में भी खड़ा किया गया। इस उतार-चढ़ाव वाले हिन्दी कथा साहित्य के सफ़र में जो नाम, हिन्दी कहानी और उपन्यासों दोनों की ही दशा और दिशा बदलने के लिए एक लम्बे समय से बहुत सम्मान से लिया जाता रहा है, वह नाम है बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी कथाकर कमलेश्वर का।

'नई कहानी आन्दोलन के पुरोधा कमलेश्वर एक स्त्रीवादी कथा साहित्यकार के रूप में भी प्रतिष्ठित किये जा सकते हैं'। इसी बात को प्रमाणित करती है डॉ. करुणा शर्मा द्वारा लिखित यह पुस्तक। कमलेश्वर के कथा साहित्य में स्त्री-विमर्श का एक अनूठा एवं अद्वितीय रूप देखने को मिलता है। उन्होंने स्त्री-विमर्श को उसकी देह तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि भावनाओं और संवेदनाओं से उसमें प्राणों की प्रतिष्ठा कर, एक स्पंदन पैदा किया है। उन्होंने तत्कालीन समाज की स्त्री की समस्याओं एवं आवश्यक्ताओं को न केवल जाँचा-परखा बल्कि क़दम-क़दम पर उनका समाधान भी प्रस्तुत किया। उन्होंने समाज की वंचित एवं शोषित स्त्री की व्यथा को न केवल प्रस्तुत किया बल्कि पग-पग पर उसके साथ खड़े हो, उसे द्वन्द्वमुक्त करने का साहसिक प्रयास भी किया और इसीलिये उनकी रचनाओं में स्त्री अपनी पूरी गरिमा, सम्मान एवं आत्मविश्वास के साथ उपस्थित है।

कमलेश्वर के बहुआयामी स्त्री-विमर्श का विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संदर्भों में अवलोकन करती, उन्हें रेखांकित करती, वर्तमान समय की कसौटी पर कसती डॉ. करुणा शर्मा की यह पुस्तक कई बिन्दुओं की बिल्कुल नये सिरे से पड़ताल करती दिखाई देती है। कमलेश्वर के कथा साहित्य में पाये जाने वाले स्त्री चरित्रों के द्वारा आज की नारी के सशक्त्तिकरण के लिए रोपे गए बीजों को डॉ. करुणा शर्मा ने बहुत मौलिकता से तलाशा है, चिन्हित किया है। उनका यह शोध स्त्री-विमर्श के लिए पूरी तरह से एक नई ज़मीन तैयार करता है। कमलेश्वर के कथा साहित्य में स्त्री-विमर्श को इस पुस्तक के माध्यम से एक नये प्रकाश में देखा जा सके, इसी कामना के साथ……………

- विवेक मिश्र - www.vivechna.blogspot.com

अंतस का संगीत- काव्य संग्रह




कृति : अंतस का संगीत
विधा : दोहे एवं गीत
रचनाकार : अंसार क़म्बरी
प्रकाशक : नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली

वितरक : शिल्पायन, दिल्ली
मूल्य : रु 150/-

जब रात होती है तो कोई अंधेरा देखता है, कोई आसमान की तरफ़ खिड़की खोल लेता है, कोई आसमान में फैले हुए असंख्य तारे देखता है, कोई उनमें से ढूँढ के ध्रुव तारा भी देख लेता है, जो सारे तारों से अलग खड़ा है……पर जो विराट आसमान में असंख्य तारों के बीच, दूर खड़े ध्रुव तारे का आसमान में दूर होते जाना, उसका निष्कासित किया जाना देख लेता है, जो उसकी चमक के उत्सव में भी उसके आसमान से निष्कासन का दुख देख लेता है, वह सच्चा कवि होता है। वह सदियों पुराने दर्दों को महसूस करता है, उन्हें जीता है। ख़ुद धागा बनके उन्हें अपने में पिरोता है। अपने दुख-दर्द दबाकर दूसरों के ज़ख्मों पर मरहम रखता है, उन पर आँसू बहाता है। उन्हें गीतों में, ग़ज़लों में, दोहों में ढालता है। वह आँखों में सूखती नमी को पालता है, सहेजता है और चुपके से संस्कृति और साहित्य की ज़मीन तैयार करके, उसमें उस नमी को बो देता है, जिससे सदियों तक आने वाली पीढियाँ मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं के पेड़ों को बोते, रोपते और सींचते कटी है अंसार क़म्बरी की ज़िन्दगी। उन्होंने दर्द के मौसमों में कबीर की तरह उत्सव मनाया है, तो संत दादू की तरह झूठी चकाचौंध के बीच सिसकती पीर को पढ़ा है। आज यहाँ हर चीज़ बाज़ार में बिकने के लिए खड़ी है, हमारे चारों तरफ़ दुकानें सजी हैं, शुक्र है कि हमारे बीच एक अंसार क़म्बरी हैं।

- विवेक मिश्र -
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Nov 20, 2010

संदेश की कविता - त्रिधा














पुस्तक नाम - 'त्रिधा'
विधा - कविता संग्रह
रचनाकार - डॉ. अनामिका रिछारिया
प्रकाशक - जे.एम.डी पब्लिकेशन, दिल्ली
पुस्तक समीक्षक - दिनेश बैस, 3 गुरूद्वारा, नगरा, झांसी - 284003 (0510-2311015/0800-4271503)
प्रति सम्पर्क - डॉ. अनामिका रिछारिया, B-3/4, तालपुरा योजना, आवास विकास, कानपुर रोड, झांसी(उ.प्र)


आश्चर्य होता है कि स्प्रिट, क्लोरोफार्म की उबकाई पैदा करने वाली गंध में रची-बसी, ख़ून-मवाद, बास मारते घावों का दिन रात सान्निध्य और

"जल रहा है शहर, आग क्यों दिखती नहीं,
मन सुलगते हैं और धुआं क्यों उठता नहीं"

जैसी संवेदनशील पंक्तियां लिखना। एक डॉक्टर के साथ कवियित्री बन जाने की दुर्घटना कैसे हो गई। लेकिन विश्वदि व्याकरणाचार्य स्व.पंडित कामता प्रसाद की पौत्री तथा स्वनाम धन्य भाषाविद् डॉ. राजेश्वर गुरू की पुत्री डॉ. अनामिका रिछारिया को साहित्यिक जीन्स संस्कार से ही मिले थे। उन्हें साहित्यकार ही बनना था। डॉक्टर बनना एक संयोग हो सकता था। यह जन्मना संस्कार इतने प्रबल थे कि बाद में झांसी के प्रमुख राजनैतिक परिवार में व्याहने के बाद राजनैतिक परिवेश भी उन्हें संक्रमित नहीं कर पाया। पेशे से वे डॉक्टर रहीं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका तक का दायित्व सम्भाला। कर्म से कहानी-कविता-चित्रकला में स्वयं को आज़माती रहीं।

'त्रिधा' डॉ. अनामिका रिछारिया का संग्रह नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं-रेडिओ पर दस्तक देने के साथ-साथ पूर्व में भी उनके कथा और काव्य संग्रह आ चुके हैं।

अन्ठान्वे कवितायें डॉ. अनामिका के संग्रह 'त्रिधा' में संग्रहित हैं। उनकी रचनाओं में मुक्त प्रवाह है। विषय विशेष के प्रति वे बाध्य नहीं हैं। उनकी कविताओं में बचपन की किलकारी है तो यौवन की अतृप्त प्यास भी है और आनेवाली पीढ़ी के प्रति संवेदनशील विश्वास भी है। उनके विभिन्न शेड्स देखिए -

'बोल दिया अंशु ने रेडी/ढूढ़ रहे अंशु को डैडी/ढूढ़ लिया बिस्तर के नीचे/
ढूढ़ा अल्मारी के पीछे/ ढूढ़ लिया है बाग़-बग़ीचे/ छुपी हुई थी अंशु रानी, मम्मी के पलकों के पीछे'

'तुम मेरे सपने हो/ पर तुम्हारा मौन मुझे तुम तक पहुँचने नहीं देता'

'दिल का कोना ख़ाली है, दर्द वहीं पर होता है,
देता है आशीष तुम्हें, पर मन चुपके से रोता है'

डॉ. अनामिका रिछारिया की रचनाओं में निराशा-हताशा कम ही मिलती है। उनमें उर्जा का स्तर बहुत ऊँचा है। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चलती हैं वे -

'चाहती हूँ बनना शिखा दीप की/ या मोती बनूं विश्व की दीप की
रूढ़िओं के तम को हटाती चलूं/ नई उमंगें मन में जगाती चलूँ'

डॉ. अनामिका रिछारिया ने बहुत हल्के-फुल्के मूड की कवितायें भी लिखी हैं -

'सासू ऐसी चाहिये, जैसा सूप सुभाय
दहेज-दहेज तो रख लहे, बहू को देहि जलाए'
या
'पैसा इतना खाइये, जितना लेय पचाय,
बीवी हार में ख़ुश रहे, छापा न पड़ पाये'

'अर्ज़ी लिख-लिख जग मुआ, अर्ज़ी पढ़े न कोय
ढाई दिना हड़ताल की करे, सो कारज होय'

सामाजिक सरोकारों से अनामिका रिछारिया मनोयोग से जुड़ी हैं। कविता लिखना उनके लिए कला प्रदर्शन नहीं है बल्कि संदेश पहुँचाने का माध्यम है। शायद यही कारण है कि उनकी रचनाओं में पॉलीथिन, स्त्री शिक्षा, दहेज दमन, कन्या भ्रूण हत्या, पर्यावरण संरक्षण, जन संरक्षण, पोलिओ उन्मूलन, परिवार नियोजन, एड्स, टीकाकरण जैसे विषयों पर भी सरल-सहज और कभी-कभी स्लोगन के स्तर पर भी कवितायें मिलती हैं।

डॉ. अनामिका रिछारिया कहानियाँ भी लिखती हैं। बुन्देली परिवेश में पनपी उनकी कुछ कहानियाँ तो बेहद संवेदनशील हैं। मुझे लगता है कि कहानियों में वे अपने आपको ज़्यादा बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाती हैं।

- दिनेश बैस -

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Nov 12, 2010

पुस्तक-समीक्षादस्तावेजी महाकाव्य : सत्तावनी श्रध्दांजलि


कृति : सत्तावनी श्रध्दांजलि
विधा : महाकाव्य
रचनाकार : डॉ. गुरु प्रसाद ‘शुभेश’ भट्ट
सम्पादक : डॉ. ए.के.पाण्डेय
प्रकाशक : राजकीय संग्रहालय, झाँसी
मूल्य : रु 75/-
पृष्ठ : 124

डॉ. गुरु प्रसाद शुभेश प्रवृत्ति और पेशे से चित्रकार हैं। अन्वेषी स्वभाव के कारण संभवत: उन्होंने चित्रकला में डॉक्टरेट किया है। सन् 1957 में उन्होंने कला शिक्षक के रूप में चित्रकला का शिक्षण प्रारंभ किया, जो अनवरत् झाँसी के ऐतिहासिक विद्यालय, ‘बिपिन बिहारी इण्टरकॉलेज’ से जून 1994 में सेवानिवृति तक चलता रहा। वैसे वे स्वयं में कला शिक्षण संस्थान रहे हैं। चित्रकला शिक्षण को समर्पित लगभग तीस संस्थाओं के संस्थापक डॉ. शुभेश रहे हैं। आज झाँसी के अस्सी प्रतिशत से अधिक स्थापित तथा प्रयासरत चित्रकारों ने डॉ. शुभेश से किसी न किसी प्रकार कुछ न कुछ सीखा है। झाँसी रेलवे स्टेशन सहित देश के तमाम सरकारी-ग़ैर सरकारी संस्थानों में डॉ. शुभेश की पेंटिंग्स सज्जित हैं।हिन्दी, अंग्रेजी, अवधी, बुन्देली भाषाओं/बोलियों में पारंगत डॉ. शुभेश एक महाकवि होने की हैसियत भी रखते हैं, यह उनकी काव्य-पुस्तक ‘सत्तावनी श्रद्वांजलि प्रकाशित होने पर ही जान सके।झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरित गायकों का सिलसिला संभवत: स्वर्गीया सुभद्रा कुमारी चौहान से भी पहले से आज तक चला आ रहा है। लेकिन डॉ. शुभेश इस सिलसिले की कड़ी नहीं हैं। वे इसलिए स्वयं में मौलिक हैं कि उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने रानी झाँसी को अति मानवी मानने से इनक़ार किया है। गहन शोध और घटनाओं की तार्किकता के आधार पर उन्होंने बजबजाती भावुकता से हट कर स्त्री-शक्ति के सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में रानी को सत्तावनी श्रध्दांजलि में प्रतिष्ठित किया है।महाकाव्य के संपादक डॉ. ए के पाण्डेय के शब्दों में कहें तो ‘यह काव्यमय श्रध्दांजलि, छिपे इतिहास को सामान्य पाठकों तक लाने का प्रयास है।’जहाँ तक छिपे इतिहास को खोजने का प्रश्न है तो इस संबंध में डॉ. शुभेश की समझ है-जीवन-विकास का प्रकाश कहीं से आप,आने दो, उस जैसा उज्ज्वल भविष्य का तूर्ण कहाँ?उनकी तिलमिलाहट यह है कि उनके शहर के लोग जानकारियों को गुप्त रखने विश्वास करते हैं। उन्हें बाहर नहीं आने देना चाहते हैं। ज़्यादातर प्रकरणों में तो भ्रामक सूचनाएँ देते हैं-सूचना ग़लत देत बुध्दि मन मथ देतयह स्थिति तथ्यों को कहीं गहरे दफ्न कर देती है। मिथकों को इतिहास की तरह स्थापित कर देती हैं। लेकिन डॉ. शुभेश ने ऐसी तर्कहीन जानकारियों/मिथकों को मानने से इनक़ार किया है। चाहे वह रानी के दामोदर राव को पीठ पर बांध कर क़िले से छलांग लगाने का प्रसंग हो या वीर रस की झोंक में पत्थर के स्तम्भ को तलवार से काटने की बात हो। ऐसी कनबतियों को डॉ. शुभेश ने ललकारा है। रानी के इतिहास को विज्ञान सम्मत बनाने के लिए कहा है-‘रानीकूदी’ थीं किला से कुदवान कोउ, पीठि बांधिकूद कर कबहू दिखावै कोउ?महल-खम्भ काटिबे को, कोऊ बनैना वारपूरे फल-धार की तरवारि तो बतावै कोउ॥पत्थर कटत नैइयाँ, टूटत सुधैयाँन सूधतिरछी तरवारि मारि, काटि कै दिखावै कोउ?जे उपहास बिन्दु, इनको मिटाव अब,इन्दु-यश रानी को, वैज्ञानिक बनाव कोउ!पुस्तक के अधिकांश द्वन्द बुन्देली में लिखे हैं लेकिन अभिव्यक्ति में भाषा आग्रह नहीं है। इसके लिए ‘इल्ट्रॉयड’, ‘बाइ-सेप्स’, ‘स्केपुना’ जैसे अंग्रेजी के तकनीकी शब्द आते हैं तो उनका भी बुन्देली छन्दों में स्वागत हुआ है।महाकाव्य को लेकर डॉ. शुभेश कितने गंभीर रहे हैं, कितना परिश्रम किया है उन्होंने, यह समझने के लिए उनका आत्मकथ्य (कुछ इधर की, कुछ उधर की) पढ़ना अपने-आप में रोचक है।पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए मूल काव्य के अलावा पाँच खण्डों में बाँटा गया है। इनमें ‘झाँसी का मानचित्र’, ‘मानचित्र-परिचय’, ‘झाँसी राज्य पर अमलदारी का काल-विभाजन’, ‘संदर्भ’, ‘किले का रेखांकन (डॉ. शुभेश द्वारा चित्रांकित) मय परिचय के सहित नौ परिशिष्ट समाहित हैं।जबकि छंदबध्द रानी चरित् को ‘मंगल-आचरण’, ‘प्रभाव’, ‘प्रवाह’, ‘झाँसी-झलक’, ‘राज्याभिषेक’, ‘कुँवर सागर सिंह’, ‘मेला में झमेला’, ‘सैन्य-अभियान’, ‘झाँसी का किला-परिचय’, ‘बारह द्वार’, ‘बारह उपद्वार’, ‘सावधान’, ‘तैयारी’, ‘युध्द’, ‘पटल परिवर्तन’, ‘सर्व वै पूर्णयज्ञं स्वाहा’, ‘ग्वालियर’, ‘पुन: झाँसीपुरी’, ‘श्रध्दांजलि’ शीर्षकों में विभाजित किया गया है।मुझे लगता है कि यह पुस्तक अगर गद्य में लिखी जाती तो इसकी ‘अप्रोच’ ज्यादा व्यापक क्षेत्र तक हो सकती थी। जैसी कि डॉ. शुभेश की ही अंग्रेजी में लिखी एक अन्य पुस्तक ‘देवगढ़ एन अन-अर्थली प्लेज़र’ है।छंव, वह भी बुंदेली भाषा में आम पाठकों को पुस्तक से विरत् कर सकते हैं। हालाँकि डॉ. शुभेश ने बुन्देली के अप्रचलित शब्दों के अर्थ संदर्भ में दिए है लेकिन इनकी संख्या इतनी अधिक है कि लगातार पढ़ने का क्रम भंग होता रहता है। इतिहास या विज्ञान का पाठक तो इस क्रम-भंग का आदी होता है, सामान्य पाठक नहीं।यह सोचकर ही सिहरन होने लगती है कि कुल 203 छंदों के लिए 2031 संदर्भ-बिन्दु दिए गए हैं। संभवत: अंतिम दो छन्द ही ऐसे हैं जिन्हें संदर्भ से मुक्ति मिली है।

-दिनेश बैस-




Sep 25, 2010

पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य

पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य - विवेक मिश्र
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किताब - शिक्षा का कर्म-साहित्य का मर्म- डॉ अरुण प्रकाश ढौंडियाल
संपादक - डॉ विवेक गौतम



डॉ अरुण प्रकाश ढौंडियाल जी को मैं उनसे साक्षात् मिलने के पहले से ही उनकी कहानियों के माध्यम से जानता था, पर जब मैं उनसे मिला, मैंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से जाना तो पाया कि एक विद्वान शिक्षाविद्, कुशल प्रकाशक के साथ-साथ वह बहुत गहरी संवेदनाओं के कवि भी हैं। उस कवि के भीतर ही, अपनी कुशल प्रकाशक की छवि से इतर, बड़े जतन से उन्होंने पहाड़ी संस्कृति और प्रेम से लबालब हृदय वाले इंसान को संजो कर रखा है। वह इंसान जो दूसरों की तकलीफ़ में मीलों चल सकता है। वह इंसान जो इस महानगर की आपा-धापी में भी अपना काम छोड़कर दूसरों की मदद में जुट सकता है।
वे सहज ही अपने स्वभाव से एक किस्सागो हैं। वह जो कुछ सुनाते, लगता यह तो एक नई कहानी का प्लॉट है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि एक कवि-कहानीकार के रूप में उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उससे कहीं ज़्यादा अभी भी उनके मन में है, उनकी स्मृतियों में है, जिसको अभी पन्नों पर उतरना बाक़ी है।
उनके भीतर के कहानीकार की प्रतिभा अन्य समकालीन आंचलिक कहानीकारों से अलग है। वह बहुत सहज, सरल रहते हुए भी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थियों पर पैनी नज़र रखते हैं। वह उम्र के छ: दशक पार करने के बाद भी, उस माटी से, उस परिवेश से जुड़े हैं जहाँ उनका जन्म और पालन-पोषण हुआ। आज भी पहाड़, उसकी संस्कृति, वहाँ के समस्त क्रियाकलाप, जीवन की ऊहा-पोह, उसके संघर्ष और साथ-साथ वहाँ की प्राकृतिक छटा, वहाँ का सौन्दर्य, वहाँ के निवासियों का प्रेम एवं वात्सल्य, उसकी निश्छलता उनके मन-मस्तिष्क में, उनके व्यक्तित्व में पूरी ताज़गी के साथ उपस्थित है। उनकी कहानियों में यदि पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों का लेखा-जोखा है, तो वहाँ के आनंद और उत्सव का भी ज़िक्र है। वे विस्थापन के दर्द को समझते हैं और अपनी कहानियों में बहुत धीरे-से संबंधों के टूटने की कसक को पिरोते है। डॉ ढौंडियाल ने भले ही पहाड़ छोड़ दिया हो, पर वह पूरे आयतन और भार के साथ उनमें बसा हुआ है, जैसे चंदन की शाख़ पेड़ से कट कर भी उसकी ख़ुशबू हमेशा अपने साथ रखती है, वैसे ही उनमें, उनकी आँखों में पहाड़ की संस्कृति, उसका भोलापन सजा रहता है, जो उनसे मिलने पर महक उठता है। ……… चमक उठता और धीरे-धीरे प्रेम का अरुणोदय होने लगता है उसका प्रकाश फैलने लगता है। इस प्रकाश की चमक बढ़ती रहे। उसकी किरणों का सान्निध्य सदा बना रहे, इसी कामना के साथ।

-विवेक मिश्र-




Sep 17, 2010

गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ -'आज का दुर्वासा' कहानी संग्रह


गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ हैं सन्तोष खन्ना के कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' में।
समीक्षक - विवेक मिश्र

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कृति - आज का दुर्वासा
विधा - कहानी
कहानीकार- सन्तोष खन्ना
प्रकाशक - भारत ज्योति प्रकाशन
मूल्य - रू 250/-

हिन्दी कहानी पूरी सदी का सफ़र तय कर चुकी है। अक्सर ही कहानी को लेकर सामाजिक बदलावों और नई क्रान्तियों की घोषणा भी की जाती है, लेकिन कईयों बार इस पर सवाल भी उठे हैं और इसे कटघरे में भी खड़ा किया जाता रहा है। अपने भीतर-बाहर तमाम सवालों के जवाब ढूँढती, आगे बढ़ती हिन्दी कहानी का स्वरूप बदलता रहा है। आधुनिक हिन्दी कहानियों पर रूसी कहानियों का गहरा असर दिखाई देता है, जिसमें उसकी अच्छाईयाँ और बुराईयाँ बराबर से घुली-मिली दिखाई देती है। परन्तु अस्सी और नब्बे के दशक में कई कहानीकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने इस प्रभाव को पीछे छोड़ते हुए अपने ही अन्दाज़ में अपने पूरे देसीपन के साथ कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियाँ वास्तविक भारतीय जीवन के बहुत निकट हैं और उसकी प्रस्तुति भी कहानी की घटनाओं के अनुरूप है। इनमें देसी बात विदेशी ढंग से या उधार के शिल्प में ढालकर कहने की सनक नहीं है। ऐसी ही एक लेखिका हैं सन्तोष खन्ना, जो कवयित्री और संपादिका तो हैं ही, अपने समय की श्रेष्ठ कहानीकार भी हैं।

सन् 2009 में सन्तोष खन्ना का कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी लगभग अट्ठारह छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं। संकलन की पहली कहानी 'आज का दुर्वासा' आज के समय की, समाज की तमाम पर्तें उघाड़ती एक बेबाक कहानी है, जो आज के समय को नंगा करके, हमारे प्रगति के सारे दावों की पोल खोल के रख देती है। इस कहानी को पढ़ते हुए उदय प्रकाश की 'तिरिछ' याद जाती है। 'तिरिछ' में शहर की निर्ममता का शिकार एक भोला-भाला ग्रामीण है, पर यहाँ यह सब कुछ शहर में रहने वाले, एक ऐसे व्यक्ति के साथ बीता है, जिसका जीवन शहर में ही बीता है, पर फिर भी यह शहर, यह तन्त्र उसके लिए एक निष्ठुर और विकराल पिशाच सिद्ध होता है, जो उससे उसका नाम, घर, सम्मान, उसकी अस्मिता सब कुछ छीन लेता है, यहाँ तक कि उसकी बुद्धि, विवेक भी। सब कुछ खो चुकने के बाद भी एक बात जो उसके चरित्र में शेष रह जाती है, वह है उसका आक्रोश और वही उसे आज का दुर्वासा बना देता है। कहानी का अन्तिम वाक्य महानगरों में बसे पूरे संवेदनाहीन समाज को दिया गया उस आदमी का श्राप है, जिससे इस शहर ने उसका सब कुछ छीन लिया है। वह कहता है "तुम्हारे बच्चे तुम्हें पहचानना भूल जाएँ……"।

सन्तोष खन्ना की कहानियाँ हमारे आस-पास के जीवन में बिखरे तमाम रंगों को समेटती हैं, इसमें इतिहास, वर्तमान और कहीं-कहीं भविष्य की झाँकिया भी देखने को मिलती हैं। वह प्लॉट को बड़े सरल ढग से शुरू करके, बड़ी सहजता से बुनती हैं। कहानियाँ पढ़ते वक़्त लगता है हम कहानियाँ देख रहे हैं। पात्र आपस में ही नहीं बल्कि पाठक से भी संवाद कर रहे हैं। ऐसी ही एक कहानी है 'नास्तिक' जिसमें बड़ी सहजता से धर्म और अध्यात्म जैसे जटिल विषय की गूढ़ गुत्थियों को कहानीकार ने एक छोटी-सी कहानी में बड़े निर्दोष ढंग से सुलझाया है। अच्छी बात यह है कि कहानीकार स्वंय उपदेशक नहीं है। वह स्वंय पाठक के साथ अपनी समस्याओं से जूझ रहा है। वह स्वंय भी कई अनसुलझे सवालों के झुरमुट में खड़ा है, और यही बात सन्तोष खन्ना को अन्य कहानीकारों से अलग करती है।

'पंसेरी' संग्रह की एक और छोटी कहानी है, जो स्त्री शोषण की व्यथा को एवं समाज द्वारा स्त्री को वस्तु के रूप में देखे जाने की वृत्ति को दर्शाती है।

'प्रायश्चित' कहानी में संतोष ने कथा की एक नई दहलीज़ बनाई हैवह कथा के विराट विस्तार को अपने में समेटे हुए है, जिसकी अलग से चर्चा की जानी चाहिए।

'बेबसी', 'साझेदारी', 'बिना टिकिट' और बूट पालिश संग्रह की अन्य अच्छी कहानियाँ हैं।

सन्तोष खन्ना की हरेक कहानी गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानी है। हरेक कहानी सरल ढंग से कही गई परन्तु गहन संवेदनाओं और जटिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करती, मानवीय मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करती है। संग्रह की कहानियाँ स्वतंत्र रूप से एवं विस्तार से एक साहित्यिक चर्चा की माँग करती हैं। अवसर एवं मंच मिलने पर ऐसा अवश्य संभव होगा। कहानियों के भीतर छुपी लेखिका की संवेदनाएँ पाठक के भीतर गहरे में अपनी पैंठ बनाने और अपनी छाप छोड़ने में सफ़ल होंगी, इसी विश्वास के साथ। सन्तोष जी को संग्रह के लिए शुभकामनाएँ।

- विवेक मिश्र -
मोब: 9810853128

Aug 20, 2010

ग़लत समय पर प्रकाशित सही कविताएँ














कृति- अतीत के प्रेत
विधा- कविता
कवि- जगदीश सविता
प्रकाशन- सारांश प्रकाशन
मूल्य- रु 100

‘अतीत के प्रेत’ जगदीश सविता जी का एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें पौराणिक और मिथकीय पात्रों-चरित्रों और घटनाओं के माध्यम से कवि हमारी संस्कृति की जड़ों में बैठे ढकोसलों की बड़ी बारीक़ी से पड़ताल करता है। वह सदियों से महिमा-मंडित किए जाते रहे देवतुल्य या स्वयं अवतार कहे जाने वाले चरित्रों की भी पोल खोलता है, उनसे सवाल करता है और उनकी दिव्यता को, उनके अस्तित्व को कठघरे में खड़ा करता है। वह पुराणों और मिथकों में से ही ऐसे चरित्र, ऐसी घटनाएँ ढूंढ लाता है, जो गवाह हैं इस बात की, कि कमज़ोर का शोषण हर हाल में, इस काल में होता रहा है, होता रहेगा। इससे छुटकारा तभी संभव है जब हम अपनी ऑंखों से अंधविश्वास की पट्टी हटाएँ, अपने विवेक को जागृत करें, हर वर्ग का, हर व्यक्ति शिक्षित हो, ताकि सुनी-सुनाई मन-गढ़न्त बातें उसके जीवन का मार्ग निर्धारित न करें। वह अपना सत्य स्वयं खोजे, उसे जाँचे-परखे, चाहे उसे हज़ारों-लाखों बार गिरना पड़े, मुँह की खानी पड़े।

…पात्र हैं महाभारत के
एक से बढ़कर एक
लम्पट शान्तनु
कुण्ठाओं का गट्ठड़ भीष्म
भाड़े का टट्टू द्रोण
और निरीह शिशुओं का हत्यारा
उसका कुलदीपक
दूरदर्शी संजय
अंधा धृतराष्ट्र
फूट चुकी हैं जिसकी
हिय की भी!
….और पहलवान भीम
नपुंसक धनुर्धारी
और उसकी गाड़ी खींच ले जाने वाला
छलिया कृष्ण
जिसे भगवान मानने में ही ख़ैर
ये सभी
मानो चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हों
”हम आज भी हैं
महाभारत कभी ख़त्म नहीं होता”

कवि इन मिथकों में, पुराणों में सच्चा इतिहास ढूंढता है और हताश होकर मात्र कविता में, या कल्पना में थोड़ा-बहुत सत्य बचे रह जाने से ही संतोष करता है, पर साथ ही झूठ के पुलिंदों से दूर रहने को आगाह भी करता है-

‘लाश घर’ है इतिहास
एक एल्बम है जिसमें
महलों के
षडयंत्रों के
युध्द के मैदानों के
कहाँ है प्राणवन्ता?
रंग… रूप… रस?
कहाँ हैं धड़कनें?
आहें?
वह तो भला हो कल्पना का।

वाक़ई इतिहास में ज़िक्र है राजाओं का, रानियों का, देवों का, अवतारों का, युध्दों का, पर कहाँ गई वो युध्द में हताहत हुए सैनिकों की सूची? कहाँ गई उन स्त्रियों की, बच्चों की चीखें, कहाँ गया उन लाखों-करोड़ों मनुष्यों के रक्त का हिसाब, जो कट गए किसी एक व्यक्ति के स्वार्थ के लिए,किसी एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए। क्यों उनके लिए नहीं चला सुदर्शन चक्रद्व क्यों उनकी रक्षा के लिए नहीं अस्त हुआ समय से पूर्व सूरजद्व क्यों नहीं शहीद हो गए मुस्कुराते हुए महानायक युध्द में-

यदि तुम चाहते तो
रुक सकता था महासमर!
तुम्हें तो मालूम था योगिराज!
विषाद ही तो है
योग के सोपान का प्रथम पायदान
आत्मग्लानि में डूबा
द्रवितमना अर्जुन
क्या ज़रूरत थी
उस सत्रह अध्याय लम्बे वाग्जाल की?
…बच सकते थे अठारह अक्षौहिणी जीवन
यदि तुम चाहते तो!

जगदीश सविता जी की कविताएँ उस समय की कविताएँ हैं जब आज़ादी के बाद लोग सकारात्मक बदलाव के सपने देख रहे थे। कविता छन्दों से निकल कर मुक्त हो रही, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को आम आदमी के शब्दों में कहा जा रहा था। यूँ कहें कि नई कविता की नींव पड़ रही थी, जब मुक्तिबोध को, उनकी कविताओं को बहुत बड़ा कवि वर्ग नकार रहा था और वहीं-कहीं मुक्तिबोध के लिए, उनकी कविता के लिए ज़मीन तैयार हो रही थी-

क्या दिन थे वे भी…
रोज़ तीन टांग वाले स्टोव पर
वह मेरा चाय बनाना
गली के काणे कुत्ते का
हिज़ मास्टर्स वाइस के पोज़ में
आ बैठना…
…कई एकड़ में फैली
नवाब साहब की हवेली में
खुलेगा
एक दिन ज़रूर खुलेगा
कम्यूनिस्ट पार्टी का दफ्तर
लहराएगा लाल परचम
…हाँ तो पहलवान
देना एक बीड़ी
माचिस है मेरे पास
…..क्या दिन थे!

कवि बुरे हालातों में भी एक मस्त कलन्दर की ज़िन्दगी जीता है, घोर निराशा के क्षणों में भी उम्मीद रखता है, लाल परचम लहराने की। साधनहीन खड़ा है पर बेबाक़ी से मांग सकता है, छीन सकता है साधन क्रांति के….. क्योंकि ‘माचिस है उसके पास’।
सच ही है। जगदीश सविता की कविताएँ चिंगारियाँ हैं, जो सीनों में दबे बारूदों को धमाकों में बदल सकती हैं। पर अफ़सोस कि ये कविताएँ ऐसे समय में सामने आ रही हैं जब सारी पार्टियों के चेहरे से नक़ाब उतर चुके हैं। क्रान्तियों की दिशा बदल चुकी है। युवाओं का आन्दोलन वंचितों का आन्दोलन एक अंधी हिंसक लड़ाई में तब्दील हो गया है। ऐसे मैं इन कविताओं को पूरे एहतियात के साथ, उस समय से जोड़ कर पढ़ा जाना चाहिए, जिस समय में ये लिखी गई थीं।
जगदीश सविता जी के पाँच काव्य-संग्रह हिन्दी में तथा एक काव्य संग्रह अंग्रेजी में प्रकाशनाधीन है।

-विवेक मिश्र-

Aug 18, 2010

'अमिट ह्स्ताक्षर' - पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर









'अमिट ह्स्ताक्षर' - पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर जी के द्वारा लिए गए छायाचित्रों के माध्यम से, एक बीते युग का सफ़र है।


'अमिट हस्ताक्षर' वीरेन्द्र प्रभाकर जी के लम्बे फ़ोटोग्राफ़ी के कैरियर में लिए गए उन दुर्लभ चित्रों की झाँकी है, जिनमें देश का पिछले पचास सालों में बदलता चेहरा सामने आता है। संग्रह में वीरेन्द्र प्रभाकर जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते कई लेख भी हैं।
प्रकाशन की दृष्टि से इतने सारे चित्रों को इतने वर्षों तक संजोकर के रखना और उन्हें संयोजित कर पुस्तक का रूप देना सचमुच ही सराहनीय कार्य है। पुस्तक में चित्रों के माध्यम से आज़ादी के पहले गाँधी जी के समय से लेकर आजतक के आधुनिक भारत की तस्वीरें हैं।
चित्रों के चयन एवं संपादन में व्यक्तियों को अधिक महत्व दिया गया है। संग्रह में आम आदमी के, दर्शनीय स्थलों के एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के चित्रों का सर्वत्र अभाव है। ऐसा नहीं कि साठ सालों के सफ़र में वीरेन्द्र जी के कैमरे की आँख को सत्ता के गलियारों से बाहर झाँक कर गाँव में बसे असली भारत को देखने का मौक़ा मिला हो, पर संग्रह में कैमरे की आँख सत्ता के गलियारों में ही भटकती रहती है, इसीलिए संग्रह में उन्हीं लोगों के चित्रों की अधिकता दिखाई देती है जो लम्बे समय तक सत्ता में या इसके आस-पास रहकर ही देश की सेवा करते रहे हैं। कुछ चित्रों का रेसोल्युशन कम है जो छपने पर बदरंग लगते हैं, उन्हें प्रकाशन से पहले ठीक किया जाना चाहिए था।
संग्रह में संग्रहीत चित्र प्रभावित तो करते हैं, परन्तु कहीं कहीं भारत की भव्यता को प्रदर्शित करते हुए उसकी आत्मा को छूने में चूक जाते हैं।

- विवेक मिश्र -

Aug 10, 2010

कंदील की रोशनी में, सच को उघाड़ती कविताएं - विवेक मिश्र















कंदील की रोशनी में, सच को उघाड़ती कविताएं - विवेक मिश्र
(www.vivechna.blogspot.com)


स्त्री विमर्श के घेरे में आती तमाम चिन्ताओं को रेखांकित करती, दोहराती, उनका पुनःपाठ करती और अब उन चिन्ताओं के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने के लिए, स्त्रियों से आह्वान करती, एक मुखर स्वर की कविताएं हैं, कवयित्री कुन्ती के कविता संग्रह 'अंधेरे में कंदील' में। वह कहती हैं -
अब बीती बातों को
भुलाने की बात नहीं
ज़रूरत है/ बार-बार दोहराने की
कुन्ती कथ्य और शिल्प के स्थापित फ़ॉर्मेट के ढर्रे में चल कर कविताएं नहीं लिखती। वह बिना किसी वाग्जाल के, सीधे नारी अन्तःकरण की पीड़ा को व्यक्त करती हैं -
तुम कहते हो कविता
तो कह लो
यह आर्तनाद है! ……उस स्त्री का
जिसे लाया गया कई बार
कसाईखाने में!
कुन्ती ने अपनी कविताओं से स्त्री विमर्श के विभिन्न अंधियारे कोनों में, नारी शोषण के ख़िलाफ़ यहाँ-वहाँ, जलती-बुझती रोशनी को समेट कर, एक कंदील जलाई है, जो धीरे-धीरे मशाल में तब्दील होती लगती है -
हज़ारों अंधेरे
अपने आप में समेटे हुए
ठिठुरते हाथों में, थामे हैं
वो जगमगाता कंदील
पर उसकी एक भी किरण
उस पर नहीं पड़ती।
इस संग्रह में कुन्ती ने न केवल दलित, शोषित, अनपढ़ और पिछड़ी महिलाओं की समस्याओं की बात की है, बल्कि पढ़ी-लिखी, कामकाजी, नए समय और विकास के साथ तालमेल बिठाती महिलाओं के मन में भी झाँका है -
यूँ तो कहने को तुमने
मेरे जीवन के
अधिकतम पृष्ठ पढ़े हैं।
फिर भी यही कहते रहे
कि नहीं समझ पाया तुम्हें अब तक
………पर तुमने
पढ़ना ही मुझे
अंतिम पृष्ठ से शुरू किया था।
इस संग्रह की कविताओं में विविधता है पर इनके केन्द्र में नारी जीवन की समस्याएं, उसका दुख-दर्द और कहीं-कहीं उसमें दबी-छुपी बदलाव की एक हल्की सी उम्मीद है। पर अभी भी वह, ये बदलाव अपनी स्त्री मन की कोमलता के साथ, अपने रिश्तों और उनके वर्तमान सामाजिक ताने-बाने के साथ ही पाना चाहती है। वह चाहती है उसके आस-पास का वातावरण, समाज, परिवार, व्यक्ति सब इस बदलाव की ज़रूरत को महसूस करें। न कि वह अकेली परिवर्तन की ओर, इन सबको पीछे छोड़ती हुई, आगे बढ़े। इसीलिए वह कहती है -
समय के स्लेट पर/
वर्तमान की क़लम से तुम/
इतना भर लिख दो/
कि रोशनी तेरे लिए भी है/बस/
सुबह तक इन्तज़ार कर।
कुन्ती की कविताओं में सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद है। उनकी उम्मीद, बदलाव की मशाल बने। इसी इच्छा के साथ………

- विवेक मिश्र -
(www.vivechna.blogspot.com)

Aug 7, 2010

सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं


सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं
- विवेक मिश्र (www.vivechna.blogspot.com)






डॉ सुधीर सागर के कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो' की कविताएँ, एक संकटग्रस्त समाज के भीतर, निरन्तर संघर्षरत, उस वर्ग विशेष की पीड़ा को स्वर देती कविताएँ हैं, जिसे देश और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा न केवल नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उसकी उपस्थिति और अस्तित्व को ही सिरे से नकारा जाता रहा। आज इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध में जहाँ हर छोटा-बड़ा रास्ता हमें खींचकर बाज़ार की ओर ले जा रहा है। हर चीज़ की क़ीमत तय हो चुकी है। विचार से लेकर व्यक्ति तक, रूपहली पैकिंग में, बिकने के लिए बाज़ारों में सजे हैं। तेज़ी से बदलते इस देश में, एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी वहीं खड़ा है जहाँ सदियों पहले उसे, आँखों पर धर्म और वर्ण व्यवस्था की पट्टी बाँध कर, सदा-सदा के लिए, अंधेरे में, सड़ांध में पीढ़ी दर पीढ़ी एक अभिशप्त जीवन जीने के लिए धकेल दिया गया था - "खण्डित शिलाओं की तरह/मौजूद हैं तन-मन पर/लहुलुहान ख़रोंचें/……यह जाति कोई विशेष प्रजाति का जानवर नहीं/ये पूरी मानव जाति का/ चिंदी-चिंदी हो चुका/ एक चीथड़ा है।"
सुधीर सागर का कवि क्षद्म विकास और परिवर्तन के पीछे छुपे ढोंग को, उदारता के स्वांग को अच्छे से समझता है और उसके चेहरे से, पूरी निर्ममता के साथ, सबके सामने, उसका मुखौटा उतार फेंकता है - "सिर उठा कर/भूल मत जाना/जिसके समीप बैठे हो/……उनका अन्तःमन जल रहा है/ स्वर्ण अभिजात्य मनसिकता की तपिश से/ ……तुम्हारे जाते ही/ चारदीवारी पर रख दिया जाएगा/ घर से बाहर/ तुम्हारी चाय का/ ………जूठा कप।"
वादों-प्रतिवादों और सिद्धान्तों से बहुत दूर, सारी बौद्धिकताओं से परे, आदिवासी ज़िन्दगियों के संघर्ष की ऐसी त्रासदी को ही बयान करती है, इस संग्रह की एक कविता 'पत्थर पर बनी लक़ीर'। इस संघर्ष को देखते हुए, सबकुछ जानते हुए भी, न हम उनके लिए कुछ कर पाते हैं और न ही हम उन्हें उनके परिवेश में अपनी तरह जीने की आज़ादी ही दे पाते हैं। तमाम व्यर्थ की बहसों के निष्कर्ष में, कुछ भी ऐसा नहीं निकल पाता, जो इस 'पत्थर पर बनी लक़ीर' को मिटा सके, जो सबको एक पूरी और निश्चिन्त साँस लेने की आज़ादी दिला सके - "पत्थर पर बनी लक़ीर/मिटाए नहीं मिटती/ अमर हो जाती है लक़ीर/बनकर एक बार पत्थर पर/ ……वर्षों बाद भी यह मिलेंगी/उन इमारतों के खण्डहरों में/ जहाँ छाई होंगी वीरानियाँ/……थारू ज़िन्दगी भी एक/पत्थर पर बनी लक़ीर है।" (थारू - आदिवासी)
सुधीर अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वर्ग के अन्तःमन पर सदियों से बने घाव जब नासूर बन जाते हैं, तो ऊपरी तौर पर महज़ कुछ नौकरियों में आरक्षण देकर, कुछ कपड़े-किताबें और वज़ीफ़े बाँटकर ……या सिर्फ़ उन्हें प्यार से हरिजन कहकर कुछ भी नहीं बदला जा सकता है। अगर कुछ बदलना है तो वह है हमारे वर्तमान समाज, प्रशासन, हमारी राजनैतिक व्यवस्था और हमारे संविधान की उस वर्ग के लिए सोच। अगर उनको कुछ देना है तो वह है उनका मनोबल, उनका सदियों पहले छीना गया आत्म सम्मान। फिर उन्हें तुम्हारे उपकार की आवश्यकता न होगी। वह स्वंय खड़े हो सकेंगे। अपनी आँखों से देख सकेंगे अपना और इस दुनिया का सच - "मैं परिंदा/ दूसरों की उड़ान देख/उड़ने की कोशिश में/गिर गया पथरीली धरा पर/क्योंकि भूल गया था/पंख काटे थे किसी ने/ सदियों पहले।"
दलितों के सदियों के शोषण का सच्चा दस्तावेज़ हैं सुधीर सागर की कविताएँ।
- विवेक मिश्र -

Jul 21, 2010

शब्दों का कोहरा - वीरभद्र कार्कीढोली




कविता संग्रह - शब्दों का कोहरा
कवि - वीरभद्र कार्कीढोली
मूल नेपाली से अनुवाद - खडगराज गिरी
प्रकाशक - दोभान प्रकाशन, सिच्छे गान्तोक,
'शब्दों का कोहरा' वीरभद्र कार्कीढोली की मूलतः नेपाली में लिखी गई कविताओं के हिन्दी अनुवादों का संग्रह है। वीरभद्र एक ऐसे कवि हैं जो नेपाली, हिन्दी, अंग्रेज़ी और असमी में एक साथ लिखते हैं। उनके अभी तक सात कविता संग्रह एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कार्कीढोली के लिए ज़िंदगी और कविता दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो "ज़िंदगी से अलग हम कोई दूसरी यात्रा के यात्री नहीं हैं। दरअसल हो ही नहीं सकते। ज़िंदगी से अलग कोई ज़िंदगी नहीं है। वस्तुतः ज़िंदगी के ही ईर्द-गिर्द ज़िंदगी की तलाश कर रहे हैं हम। कोई हँसता नहीं है ख़ुशी से, आनन्द से। हँसने वाले सभी रो रहे हैं। अन्दर ही अन्दर अपनी अन्तर पीड़ा से।"
कार्कीढोली बदलाव के कवि हैं। ज़िंदगी में और कविता में, हर समय कुछ नया बोना चाहते हैं। वर्जनाओं से, रूढ़ियों से मुक्त होने की एक कोशिश करना चाहते हैं -
कई दिन हुए
एक ही भजन दोहरा रहे हैं लोग-
इस शहर के प्रसिद्ध मन्दिर में,
भीड़ चाहती है नए भजन सुनना
पर मन चाहा भजन सुने बिना ही
घनी रात्रि में
दिया बुझा कर
बेचारे पुजारी ने आत्मह्त्या कर ली
प्रभु के मन्दिर में ही।
कार्कीढोली की कविताएँ सतत संघर्षों और नई यात्राओं की कविताएँ हैं। एक ऐसे संघर्ष की कविताएँ जो देश, काल, पात्र बदलने पर भी समाप्त नहीं होता। बस मुखौटे बदलता है।
मैं तो हिमालय देखने आया था
तुम्हारे भीतर का
भरा हुआ और पिघला हुआ
देखूँगा सोचा था
पर ऊँचाईयाँ आँकने
नहीं आया था मैं………
बहुत ऊँचाई तक चला हूँ
और अभी उतना ही चलना है…
……पर पुनः मैं वही ग़लती दोहराने
उसी जगह आ पहुँचा।
फिर उसी जगह आ पहुँचा !!
बाज़ारवाद की आँधी में ध्वस्त होती मान्यताओं के बीच लगातार शोषन का शिकार होते आदमियों की भीड़ में से ही एक कवि भी है जो डर रहा है अपने लिए, अपने जैसे और लोगों के लिए और डर रहा है ध्वस्त होती आस्थाओं और जीवन मूल्यों के लिए -
पक्षी अब तक नहीं लौटे
एक-एक कर गिर रहें हैं पत्ते
हवा भी नहीं बह रही है ख़ूब!
गिरने को है वह पहाड़!
गिर सकता है : किसी रात, किसी दिन
या नहीं तो शाम को
खड़ी थी वहीं पर मेरी भी आस्थाएं!
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताओं में जीवन के नैराश्य का चरम है। जीवन के दुखों की चमक है और सन्नाटे में भारी-भरकम पहाड़ों के नीचे दबी कई अनसुनी चीख़ें हैं, जिन्हें ध्यान से जोड़कर सुनने पर एक ऐसी कविता बनती है जो समूची मानव जाती के दर्द का, उसकी पीड़ा का, उसके आर्तनाद का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी कविताएँ समस्याओं के उत्तर नहीं हैं, बल्कि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों की प्रतिध्वनियाँ हैं। उन्हें सुनकर अगर कोई जवाब आपको सूझे तो कवि को लिखियेगा।
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताएँ शीघ्र ही आप 'काव्यान्चल' पर पढ़ सकेंगे। वह अपने परिवार के साथ गैंगटॉक, सिक्किम में रहते हैं।
- विवेक मिश्र -

Jul 7, 2010

'सरस्वती सुमन' - दोहा विशेषांक



'सरस्वती सुमन' त्रैमासिक पत्रिका का दोहा विशेषांक दोहों को उनकी पूरी समग्रता के साथ पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। पत्रिका के संपादक आनंद सुमन सिंह तथा अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' हैं। पत्रिका में हिन्दी काव्यधारा में दोहों का इतिहास, उनके प्रकार, उनका महत्व एवं उनके गुणों को उजागर करते लेख एवं साक्षात्कार हैं, जिसमें अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' की वरिष्ठ कवि गोपाल दास नीरज एवं सहित्यकार देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' से की बात-चीत, दोहों के विषय में चर्चा को नए आयाम देती है। दोहों के प्रकारों पर प्रकाश डालता डॉ राम स्नेही लाल शर्मा 'यायावर' का लेख नए दोहाकारों के लिए विशेषकर पठनीय एवं संग्रहणीय है। दोहों में मात्राओं के महत्व को बताता चंद्रपाल शर्मा का लेख भी शोधपरक है।

विशेषांक में संत दादू के दोहों से लेकर नई पीढ़ी के लगभग 125 दोहाकारों को शामिल किया गया है। इससे स्वतः ही दोहों की यात्रा एवं विकास का भान हो जाता है।

यूँ तो विशेषांक में वर्तमान समय के रचनाकारों को ही प्रमुखता से छापा गया है, परन्तु दोहों की विरासत की चर्चा हो और कोई संत कबीर को नज़र अंदाज़ करे, यह बात खलती ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे दोहों की चर्चा में कबीर की अनदेखी किसी भी तरह गले नहीं उतरती। शायद ही कोई रचनाकार यह भूल सकता हो कि हिन्दी कविता के इतिहास में कबीर और दोहे एक-दूसरे के पर्याय हैं।

विशेषांक के मुख्य पृष्ठ पर छपा चित्र विशेषांक की सामग्री के कतई अनुकूल नहीं है, जबकी भीतर के पृष्ठों पर छपे रेखाचित्र जो अतिथी संपादक अशोक 'अंजुम' के हैं, बहुत प्रभावशाली एवं सामग्री के अनुकूल हैं। अंक में पिछले दशक में छपी महत्वपूर्ण सतसईयों की भी अनदेखी की गई है, जिससे धर्म प्रकाश गुप्त जैसे बड़े दोहाकार अंक से बाहर हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कवि 'त्रीफ़ला' जो दोहों और सतसईयों के लिए जाने जाते हैं, उनकी सुध भी नहीं ली गई है। उसका कारण अधिकांश रचनाकारों का चुनाव मंचीय कवियों में से ही किया गया है, जिससे अधिकांश दोहों में विषयों की पुनरावृत्ति का दोष तो आया ही है, साथ ही कुछेक दोहे बहुत हल्के, चलताऊ और अर्थों में बहुत उथले प्रतीत होते हैं। विशेषांक के अंत में दिए दोहे से ही यदि यह बात करें तो यूँ होगी -

सब कुछ उल्टौ हो गयौ, भयौ बुरौ सब फेर ।

तुलसी, सूर, कबीर सब देख रहे अंधेर ।

दोहों को अपनी तुकों, मात्राओं और लय के कारण ही नहीं बल्कि अपने भीतर छुपे गूढ़ दर्शन और जनहित के लिए दिए गए संदेशों और शिक्षाओं के लिए भी प्रमुखता से जाना जाता है। आज दोहों का प्रयोग हल्के, चलताऊ जुमलों या नारों की तरह तालियाँ बटोरने के लिए हो रहा है। दोहा दरअसल दर्शन को समेटकर उसे संक्षिप्त कर जन साधारण तक पहुँचाने के लिए लिखा जाता था, इसकी भाषा लोक भाषा होती थी पर इसके अर्थों की कई पर्तें होती थीं। दोहों के गुणों की इस कसौटी पर कुछ ही दोहाकार आज खरे उतरते हैं। विशेषांक के कुछ दोहे -

इसक अलद की जात है, इसक अलह का अंग ।

इसक अलह औजूद है, इसक अलद का रंग ॥ -संत दादू-

अभी नहाया है छुरा, लगी सड़क पर भीड़ ।

घबरा कर दुखने लगी, बड़े-बड़ों की रीढ़ ॥

राजपथों पर खो गया, जीवन का भूगोल ।

ख़ाका सब पूरा हुआ, ख़ास बात है गोल ॥ -म ना नरहरि-

देख-देख पर्यावरण, बहा रहा है नीर ।

ताजमहल किससे कहे, अपने मन की पीर ॥

आसमान को छू रहे, आलीशान मकान ।

तरस रहे हैं धूप को, घर के रोशनदान ॥ - अंसार कंबरी-

बेशक मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इन्कार ।

पहले अपने बाट तो जाँच-परख ले यार ॥ -हस्तीमल हस्ती-

अग्निपरीक्षा भी कहाँ जोड़ सकी विश्वास ।

युग बीते, बीता नहीं, सीता का वनवास ॥ -सरिता शर्मा-

अर्थहीन कुछ ने कहा, कुछ ने अर्थातीत ।

अव्याख्येय रहस्य सा जीवन हुआ व्यतीत ॥ -शिवओम अंबर-

पत्रिका छः वर्षों में चवालीस अंक निकाल चुकी है। लगभग पौने दो सौ पृष्ठों का दोहों पर केन्द्रित यह अंक पाठकों को कई सिद्ध दोहाकारों की रचनाओं से रूबरू होने का मौक़ा देता है। नए दोहाकारों को सीखने के लिए अंक में पर्याप्त सामग्री है।

अंक - 'सारस्वतम', 1-छिब्बर मार्ग, देहरादून - 248001 से मंगाया जा सकता है।

- विवेक मिश्र -

Jun 29, 2010

'युद्धरत आम आदमी'













यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि 'युद्धरत आम आदमी' मात्र पत्रिका नहीं है। यह एक आंदोलन है। एक ऐसा आंदोलन जो तमाम आंदोलनों, अभियानों और क्रांतियों में नज़र अन्दाज़ किया जाता रहा। हमेशा जिसे धकिया कर वार्ताओं से, योजनाओं से, किताबों और पत्रिकाओं से बाहर निकाला जाता रहा। यह ऐसा आंदोलन है, जो कभी किसी राष्ट्रीय पार्टी के एजेंडे में प्रमुखता नहीं पा सका। तथाकथित बुद्धिजीवीयों ने, साहित्यकारों ने भी इसे छूने से परहेज़ किया। पत्र-पत्रिकाओं में, सहित्य में हज़ारों-लाखों की तदाद में रोज़ छपने वाले पन्नों में इस विषय को हाशिए तक पर जगह नहीं मिली।
रमणिका फ़ाउन्डेशन ने अपने तमाम प्रकाशनों के साथ 'युद्धरत आम आदमी' के माध्यम से समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे, अपनी जगह ढूँढ रहे लोगों को एक आवाज़ दी।
'युद्धरत आम आदमी' का पूर्वांक-101, 2009 - "सृजन के आईने में - मल-मूत्र ढोता भारत" जिसका संपादन रमणिका गुप्ता तथा सुशीला टांकभौरे ने किया है, जो कि अंक-103 (अप्रेल-जून, 2010) के साथ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
जैसा कि अंक के मुख्य पृष्ठ से ही बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि यह अंक बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी दुराव-छुपाव के सीधे-सीधे उन लोगों की बात कर रहा है, जो सदियों से रोज़ सुबह उठकर अपने ही जैसे दिखने वाले इन्सानों का मल-मूत्र समेटने और उसे अपने सिर पर ढोकर घर, गाँव, शहर से दूर ले जाकर फेंकने जैसे अमानवीय काम को अंजाम देते हैं। यह काम करते हाथ एक दिन के लिए रुक जाएँ तो कितने ही घरों की सुबह भी ठहर जाए। आज इक्कीसवीं सदी में विकास का दम भरते, विश्व शक्ति बनने का सपना देखते भारत की हवा उस समय निकल जाती है, जब कोई इन्सान अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने जैसे काम को आज भी करने के लिए विवश दिखाई देता है और ऐसे लोगों की संख्या दस-बीस या सौ-दो सौ नहीं बल्कि हज़ारों-लाखों में है। आज भी ग्रामीण भारत में सैंकड़ों गाँवों-कसबों में हज़ारों परिवार रोज़गार के विकल्प के अभावों में, इस काम को करने के लिए मजबूर हैं।
अंक का संपादन पूर्णतया निष्पक्ष होकर निर्भीकता से किया गया है। अंक में विषय से संबन्धित दलित लेखन को उसकी अन्तर चेतना के साथ समाहित किया गया है।
आवरण चित्र एंव कला निर्देशन डॉ सुधीर सागर का है। पत्रिका का मुख्य पृष्ठ ही विषय के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। अंक में हिन्दी के साथ मराठी, गुजराती, तेलुगू के लेखकों को भी स्थान दिया गया है। अंक में कहानी, कविता, पुस्तकों के अंशों, समीक्षात्मक आलेख एंव विवेचनात्मक मूल्यांकनों को, नाटक एंव लघुकथाओं को शामिल किया गया है।
रमणिका फ़ाउन्डेशन के इस प्रयास से अपनी जगह ढूँढते विषय एंव उस पर हो रहे लेखन और चिन्तन को पर्याप्त जगह मिली है। अंक की चर्चा भी रही। समस्या में गहराई से उतरने और उसे समझने का उन लोगों को भी मौक़ा मिला जो इस विषय में सोचने से पहले ही छी-छी कहके नाक पर रूमाल रखकर वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए इसे पूर्वजन्मों का लेखा कह कर रास्ता बदल लेते हैं।
पत्रिका जो अब पुस्तक के रूप में है, उसने दलितों को सभी भुलावों से दूर हटकर वर्ण व्यवस्था की थोथी पट्टी न पढ़कर, उसे जलाकर नए भविष्य की नींव रखने का आह्वान करती है। नई व्यवस्था रचने को उकसाती है और जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या स्वंय को दलित समझकर इस कार्य से जुड़े रहने की थोथी दलील को सिरे से खारिज करती है। दलित चेतना को जगाने की दिशा में यह एक मज़बूत क़दम है।
यह बात अजय नावरिया अपनी कविता में कुछ ऐसे कहते हैं :-
"शब्द थे, बहुत पहले से
पर मेरी मुट्ठीयों में नहीं थे
कस कर बाँध दिया था
उन्हें मेरी आँखों पर
ताकि देख न सकूँ उन के भीतर
अर्थ की चिल्लाती रोशनी को
बेशक, मुट्ठी में आते ही
चकाचौंध हुई आँखें, पल भर को
……फिर बन गया वह
झरझर झरता झरना
……ये मेरी हथेलियों पर
पंख लगाए उड़ते शब्द
ये समूचे अस्तित्व में सेंध लगाते
इनके असीमित अर्थ ……
असीमित शब्दों को उघाड़ता नए आयाम रचता, चेतना का प्रकाश फैलाता यह अंक, सचमुच जड़ मान्यताओं की आँखें चुँधिया देगा। इसकी रोशनी का स्वागत किया जाना चाहिए।
- विवेक मिश्र -




Jun 17, 2010

क्षितिज का सीमान्त

काव्य संग्रह - क्षितिज का सीमान्त
कवयित्रि - डॉ कौशल्या गुप्ता
प्रकाशक- शिल्पायन
मूल्य - 150/-
कौशल्याजी की कविताएँ किन्हीं विशेष समस्याओं, उनके कारणों या उनके समाधानों के आस-पास नहीं बुनी गई हैं। ही उनमें वादों, प्रतिवादों और सिद्धान्तों का निरूपण या खण्डन है। उनकी कविताएँ जीवन के अगाध अनुभवों की वे झाकियाँ हैं जिनमें कवि की दृष्टि एक द्रष्टा की है। उनकी कविताओं का कोई पक्ष या विपक्ष नहीं है। वे एक नदी की भाँति बहती हैं और अपने दोनों किनारों को भिगोती चलती है। इसीलिए उनकी कविताओं में दो अलग-अलग किनारे तो दिखते हैं पर धारा निष्पक्ष रहकर एक ही समय में दोनों किनारों को छूती है।
उनकी कविताओं में एक कभी न ख़त्म होने वाली ताज़गी है। उनकी कई कविताओं ने कई दशकों का सफ़र बड़े धैर्य से तय किया है। जब मैंने उनकी रचनाओं के पिटारे को खोला, तो पाया कि उसमें कितने ही रत्न छुपे हैं। बहुत कोशिश के बाद भी उनमें से सबको इस संग्रह में तो नहीं रखा जा सका, पर निश्चय ही उनकी कुछ श्रेष्ठ रचनाएँ 'क्षितिज का सीमान्त' में आपको क्षितिज का सीमान्त स्पर्श करती दिखेंगी।
- विवेक मिश्र -

May 9, 2010

आनंदम और जगदीश रावतानी







जगदीश रावतानी, गायक, कवि और आनंदम संस्था के संचालक हैं। इंडियन सोसायटी ऑफ़ ऑथर्स के कार्यक्रमों में जगदीशजी से मुलाक़ात हुई, उनकी नज़्मों ने ध्यान खींचा और उनके बुलावे पर आनंदम संस्था के एक कार्यक्रम में शामिल हुआ। जगदीश जी सिन्धी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं पर लिखने से भी ज़्यादा साहित्यिक, सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन वह जिस लगन और उत्साह से करते हैं देखते ही बनता है। उनमें जितना जोश लिखने के लिए है उससे कहीं ज़्यादा दूसरों की कविताओं को सुनने का है, जो कम देखने को मिलता है।
जगदीश कई टीवी कार्यक्रमों का निर्माण एंव निर्देशन तथा कई कार्यक्रमों में अभिनय भी कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी जगदीश रावतानी निरन्तर साहित्य सेवा में लगे हैं। उनकी अधिकांश ग़ज़लें, नज़्में और कविताएँ व्यंग्य में बहुत गहरे विचारों को, गंभीर बातों को बड़ी सहजता से कह जाती हैं।

उनकी एक कविता है:-
"मेरे पास था एक शक्तिशाली गुलेल
जिससे पत्थर फेंकने का खेलता था खेल
खेलते-खेलते महारथ हासिल कर मैं बहुत ऐंठा
प्रकृति ने किया दण्डित
जब आसमाँ में छेद कर बैठा।"

जगदीश रावतानी और आनंदम को विवेचना की ओर से शुभकामनाएँ ।
- विवेक मिश्र -

Feb 6, 2010






































हंस पत्रिका, फ़रवरी - २०१० की संख्या में विवेक मिश्र की कहानियों की किताब "हनियां तथा अन्य कहानियाँ" पर लिखी, श्री रमेश प्रजापति की समीक्षा प्रकाशित हुई है। ऊपर दी गई इमेजेस को क्लिक करने पर, समीक्षा पढ़ी जा सकती है।






















Jan 27, 2010

वर्ल्ड बुक फ़ेयर - २०१०, ३० जनवरी से 7 फ़रवरी, प्रगति मैदान, आई टी ओ, दिल्ली
शिल्पायन, हॉल नम्बर - १२ ए, स्टॉल नम्बर - १७१,१७२, व १७३ में विवेक मिश्र की तीनों किताबें:
१ हनियां तथा अन्य कहनियाँ - कहानी संग्रह
२ बोल उठे हैं चित्र - चित्र-कविता संग्रह
३ लाईट थ्रु अ लेबेरिन्थ -अंग्रेज़ी में अनुदित कविताएँ उपलब्ध हैं।






Jan 23, 2010













प्रकाशक - प्रोफ़ेसर पी लाल, राईटर्स वर्कशॉप, कोलकाता
मूल्य - रू १५०/-

पिछ्ले दिनों विवेक मिश्र की कविताओं एवं ग़ज़लों का अंग्रेज़ी में अनुवाद, प्रोफ़ेसर पी लाल, राईटर्स वर्कशॉप द्वारा, कलकत्ते से प्रकशित हुआ है। इस किताब का नाम “लाईट थ्रु अ लेबेरिंथ” है एवं इसे अमृता बेरा ने अनुवाद किया है। इस किताब को प्रकाशक के वेबसाइट http://www.writersworkshopindia.com/ पर जाकर देखा व ख़रीदा जा सकता है।

किताब से:

Desire
In a big
courtyard
racing a
small bicycle,
round and round,
a child of seven
doesn’t know
which part
of the world
he is in.

He doesn’t know
since when,
the huge,
golden sphere
shining throughout
the dawn till dusk
is wandering
across the
sky blue ground,
hanging
upside down,
above his head.

He doesn’t
even know
from where does
suddenly
the machine birds
appear,
whizzing angrily
across the
sky blue ground
and drop
balls of fire
around his house

He only understands
this much,
that even after
so much
being effaced
around him,
he is the
only one
left with
two legs,
one bicycle
and the desire
to race it
fast,
round and round,
race it
fast
round and round



Identity
I am constantly
losing my identity,
getting smaller
and even
more small.

Suppressing my anger
and frustration,
I find myself
changed into
different forms.

The mirror too
is surprised
to see my image,
for I’m taking
a new shape
each day.

Sensitivity
within me,
seems to have
drained,
for nothing
is left now,

Whatever remains
outside,
is consuming me,
and I am
consuming it too

मूल कविताएं 'इच्छा' एवं 'अस्तित्व', मेरे अन्य चिट्ठे 'कविता का कोना' में पढ़ी जा सकती हैं।

Jan 20, 2010

दिल में उतर जाने वाला शायर, ‘ज़र्फ़’ देहलवी

जहाँ की भीड़ से बचकर जब आता हूँ क़रीब अपने,
ख़ुद अपनी ही ग़ज़ल होता हूँ, ख़ुद पुरसाज़ होता हूँ।

यह सच ही है कि ग़ज़ल का फ़लक फैले तो जहाँ ढक ले और सिमटे तो किसी की आँख के आसूँ में उतर आए। ग़ज़ल उर्दु शायरी की संस्कृति का ढाँचा है। ग़ज़ल शायरी नहीं तहज़ीब है। इसलिए ग़ज़ल पढ़कर किसी की शायरी का ही अँदाज़ा नहीँ होता बल्कि उसके भीतर के इंसान का भी अंदाज़ा होता है। उसकी अंदरूनी शख़्सियत का भी अंदाज़ा होता है। ग़ालिब ने कहा है कि कोई अच्छा इंसान बने बिना, अच्छा शायर नहीं हो सकता। आर बी एल सक्सेना जिन्हें शायरी की दुनिया में ‘ज़र्फ़ देहलवी’ के नाम जाना जाता है। उनके बारे में यह बात बड़े भरोसे के साथ कही जा सकती है कि उनकी ग़ज़लें उनकी शख़्सियत का आईना हैं। उनकी ग़ज़लों की लय, उनका तरन्नुम एक भंवर की तरह पढ़ने-सुनने वालों को अपने भीतर खींच लेती है। कोई भी उन्हें सुनकर उनमें डूबे बिना नहीं रह सकता।

नई फ़िज़ा है नए गीत सुनाने होंगे,
सभी को वक़्त के दस्तूर निभाने होंगे।
‘ज़र्फ़’ ईमान बचाता था आदमी को कभी,
अब आदमी को ख़ुद ईमान बचाने होंगे।

‘ज़र्फ़’ देहलवी की शायरी महज़ शायरी नहीं, ज़िंदगी के ऐसे बेबाक बयान हैं, जो अंधेरे में बिजली से तड़कते हैं और बहुत कुछ अनायास ही नज़र आ जाता है।

आदमी लाख अहले इश्क़ सही,
आदमी बेवफ़ा भी होता है।
ज़िंदगी एक खुली किताब सी है,
इस में पर कुछ छुपा भी होता है।

‘ज़र्फ़’ देहलवी की शायरी में ग़ज़ल के लिहाज़ से वे सारी ख़ूबियाँ हैं, जिनकी ग़ज़ल कहने के लिए और उसके शेरों को आम आदमी की ज़िंदगी से जोड़ने के लिए उसमें होनी चाहिए।
उनकी नफ़ीस ज़बान , ढबदार कहन, परतदारी, मौजूदा हालात के अहम मुद्दों की गहरी जानकारी और कहने की ईमानदारी कुछ ऐसी बातें हैं जो ‘ज़र्फ़’ साहब को ग़ज़ल की दुनिया में एक अलग जगह देती है। उनकी बहुत आम और सहज लगनेवाली ग़ज़लों में कहीं बहुत गहरे में कई पर्तों के नीचे कई अलग-अलग मायने छुपे होते हैं, जिन्हें बार-बार सुनने-पढ़ने पर ही समझा जा सकता है।

इक ख़ामोशी हर जगह तारी है यूँ,
हर तरफ़ आवाज़ ही आवाज़ है।
बरहमी है क्यूँ नुमाया हर जगह,
क्या ज़मीं से आसमां नाराज़ है।

ग़ज़ल में जिस नाज़ुक अंदाज़ में अपनी बात कहने का चलन है ‘ज़र्फ़’ साहब उसे बरक़रार रखते हैं। गोया ग़ज़ल ही ‘ज़र्फ़’ देहलवी की माशूक है, इसलिए वह कड़वी बातें भी इस अदा से कहते हैं कि ग़ज़ल को कहीं चोट न पहुँचे।
आज ग़ज़ल की परम्परा को, उसके अंदाज़े बयाँ को जो लोग दिल से जीते हैं, जिन्होंने उस विधा को बहुत कुछ दिया उनमें ‘ज़र्फ़’ ‘देहलवी एक बहुत अहम नाम है। ‘ज़र्फ़’ देहलवी ने रौशनी में आने के लिए ग़ज़ल नहीं कही, बल्कि अंधेरा मिटाने के लिए ग़ज़ल कही हैं। यह फ़र्क़ उनकी शायरी पढ़ने-सुनने वालों को साफ़ दिखता है।

उठी है आतिशे बरहम कहीं से,
ख़फ़ा है आसमां शायद ज़मीं से।
हुई है इस क़दर रौशन ये दुनिया,
कि डर लगता है अब इस रौशनी से।

‘ज़र्फ़’ देहलवी की शायरी उस समय की शायरी है, जब ख़ुद को ग़ज़लगो कहने वाले लोग बार-बार कुछ नया कर दिखाने का दावा करते हैं पर अक्सर पुराने ढोल पीटते, जबरन काफ़िए भिड़ाते, अपनी जगह बनाने की जल्दी में नज़र आते हैं। वहीं ‘ज़र्फ़’ पूरी तसल्ली, पूरे इत्मीनान से ख़ुद में डूबकर लिखते हैं और दिल की गहराईयों से कहते हैं। उनकी शायरी में लोगों को रिझाने की, ख़ुद को मनवाने की कसरत नहीं है। उनकी शायरी किसी झरने सी बहती है और राह में आने वाली ज़मीन को भिगोती चलती है। इसको उनके ही शब्दों में कुछ यूँ कहा जा सकता है।


मुन्तज़िर गो दिल के बहलाने का हूँ,
मैं न महफ़िल का, न मयख़ाने का हूँ।
है अगरचे ज़िंदगी क़िस्सा वही,
मैं नया मजमून अफ़साने का हूँ।


‘ज़र्फ़’ देहलवी की शायरी का सफ़र जारी है, इसमें हर ग़ज़ल एक ऐसा पड़ाव है, जो कल ग़ज़ल के चाहने वालों के लिए एक मील का पत्त्थर बनेगा।

- विवेक मिश्र -

Jul 1, 2009

‘वसंत तुम कहाँ हो’ – स्नेह सुधा नवल



कविता संग्रह - ‘वसंत तुम कहाँ हो’
कवियित्रि - स्नेह सुधा नवल
प्रकाशक - अमृत प्रकाशन
मूल्य - रु १००/-



स्नेह सुधा नवल का काव्य संग्रह ‘वसंत तुम कहाँ हो’ की कविताएँ एक विस्तृत जीवन में समेटे गए गहन एंव नितान्त निजी अनुभवों, स्मृतियों एंव सघर्षों की कविताएँ हैं। इन कविताओं का संसार स्त्री मन के उन सघर्षों की ओर इशारा करता है, जहाँ शिक्षित, सुसंस्कृत मध्यम वर्ग की महिलाओं के जीवन में बाहर से सबकुछ सामान्य, ख़ुशहाल एंव पूर्ण दिखता है, परन्तु इस रूपहले आवरण के पीछे बहुत कुछ अप्रिय, अशोभनीय एंव असामान्य छुपा रहता है जिसे स्वंय जानने एंव अनुभव करने के बाद भी उसे ढक कर, ऊपर से मुस्कुराते रहना ही नारी जीवन की विवशता होती है।
तुम पुष्प हो माना/अपने मकरन्द में मस्त………………
पर क्यों भूल गए तुम/कि तुम फूल हो
तो मैं काँटा नहीं/तुम्हारी ख़ुशबू हूँ
जिसे तुमने अपने संग/कभी बाँटा नहीं
_____________
उगाओ जाओ तुम काँटे
मैँ फूल ही उगाऊँगी ……………
मैं समेट कर सब अपनी अंजुरी से
भर लूँगी अपना आँचल ……………
…… यही तो दिया है तुमने मन से ……

सब कुछ पा कर भी जहाँ एक कभी न भरने वाली रिक्तता, चँहु ओर फैले कोलाहल के बीच एक कभी न टूटने वाले सन्नाटे से घिरी मनोदशा में सबके बीच खड़ी होकर सबको बहुत दूर से देखती हुई स्नेह सुधा की कवियित्री जब अतीत की ओर हाथ बढ़ाती है तो मन में अभी तक संजोकर रखी स्मृतियों से कुछ ऐसे पल झरने लगते हैं, जो बहुत सुखद हैं पर आज की आपा-धापी में उन्हें पुनः पाना संभव नहीं बल्कि अब मात्र उनकी कल्पना ही की जा सकती है –
उन खण्डहरों की याद
अभी भी ताज़ा बनी है
आज भी जब याद
उस दिन की आती है
मैं अपने ही एक हाथ से
दूसरे को दबा
तुम्हारी कल्पना किया करती हूँ।

स्नेह सुधा कि कविताओं में नारी संघर्ष सतत झलकता है पर वह पुरूष के विरूद्ध नहीं खड़ा है, वह नारी के आगे बढ़ने को, उसके पुरूष हो जाने या सत्ता पलट करने के संघर्ष के रूप में सामने नहीं आता बल्कि वह नारी के अपने में निहित पूरी शक्तियों के साथ, अपने संस्कारों के साथ सामाजिक, पारिवारिक और व्यैक्तिक स्तर पर मज़बूती से खड़े रहने का पक्षधर है।
नरेन्द्र मोहन उनकी कविताओं के बारे में लिखते हैं कि इन कविताओं में बिना किसी पूर्वाग्रह के अन्तर्प्रवेश करना चाहिए। संस्कार सम्पन्न, संघर्षशील नारी के पक्ष से लिखी गई ये कविताएँ विभिन्न परम्परागत प्रतीकों के माध्यम से स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों का कथन करती हैं। वे नए ज़माने में नारी अस्मिता के नए रूपों की टोह लेती हैं। ये कविताएँ बुद्धी और भावना के द्वन्द में फँसी नारी को, उस ख़ुश्बू की ओर ले जाती हैं, जिसे पुरूष ने अपने संग कभी नहीं बाँटा।
इस संग्रह की कविताएँ अतीत की झाँकियाँ दिखाती, पीछे छूटे पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों को, स्मृतियों को समेटती, संजोती और उन्हें संवेदना के धागे में पिरोती चलती हैं। परन्तु कहीं-कहीं भावातिरेक में वे अपनी निजता के दायरे में सिमटकर किसी पुरानी डायरी के वो अधूरे पन्ने बनकर उभरती हैं, जहाँ उन्हें एक निजी अनुभव से निकल कविता बनने का सफ़र अभी करना बाक़ी है। संकलन में अलग-अलग समय पर लिखी गई कविताएँ हैं, जिनके चुनाव करने में थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था, क्योंकि यह संग्रह उनकी समस्त कविताओं का संकलन नहीं है। पर जैसा कि संग्रह की भूमिका में नरेन्द्र मोहन लिखते हैं कि इस संग्रह की कविताओं को मानों/प्रतिमानों के आग्रहों से मुक्त होकर देखा-पढ़ा जाना चाहिये और सीधे-सीधे इन कविताओं में संस्कार, स्मृति और संवेदना की जो त्रिधारा प्रवाहित है, उसका आकलन किया जाना चाहिए।
यह सही है कि उसी प्रकाश में ‘वसंत तुम कहाँ हो’ को पढ़ा जाए पर स्नेह सुधा जिस पृष्ठभूमि से हैं, उनका जो कार्यक्षेत्र है और उस सबके साथ हरीश नवल जी जैसे सूक्ष्म एंव मौलिक दृष्टि रखने वाले साहित्यकार के संग एंव सानिध्य से बड़ी उम्मीदें बँधती है, और एक आशा जमती है कि ‘वसंत तुम कहाँ हो’ एक प्रश्न नहीं एक खोज बनेगा और जल्दी ही स्नेह सुधा नवल वसंत को खोजकर अपनी अँजुरी में भरकर अपने अगले संग्रह में लाएँगी।
- विवेक मिश्र -

स्नेह सुधा नवल दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कालेज के हिंदी विभाग में वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उन्हें कबीर सेवा सम्मान सहित कई सम्मानों एंव पुरस्कारों से विभुषित किया जा चुका है।