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Aug 7, 2010

सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं


सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं
- विवेक मिश्र (www.vivechna.blogspot.com)






डॉ सुधीर सागर के कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो' की कविताएँ, एक संकटग्रस्त समाज के भीतर, निरन्तर संघर्षरत, उस वर्ग विशेष की पीड़ा को स्वर देती कविताएँ हैं, जिसे देश और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा न केवल नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उसकी उपस्थिति और अस्तित्व को ही सिरे से नकारा जाता रहा। आज इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध में जहाँ हर छोटा-बड़ा रास्ता हमें खींचकर बाज़ार की ओर ले जा रहा है। हर चीज़ की क़ीमत तय हो चुकी है। विचार से लेकर व्यक्ति तक, रूपहली पैकिंग में, बिकने के लिए बाज़ारों में सजे हैं। तेज़ी से बदलते इस देश में, एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी वहीं खड़ा है जहाँ सदियों पहले उसे, आँखों पर धर्म और वर्ण व्यवस्था की पट्टी बाँध कर, सदा-सदा के लिए, अंधेरे में, सड़ांध में पीढ़ी दर पीढ़ी एक अभिशप्त जीवन जीने के लिए धकेल दिया गया था - "खण्डित शिलाओं की तरह/मौजूद हैं तन-मन पर/लहुलुहान ख़रोंचें/……यह जाति कोई विशेष प्रजाति का जानवर नहीं/ये पूरी मानव जाति का/ चिंदी-चिंदी हो चुका/ एक चीथड़ा है।"
सुधीर सागर का कवि क्षद्म विकास और परिवर्तन के पीछे छुपे ढोंग को, उदारता के स्वांग को अच्छे से समझता है और उसके चेहरे से, पूरी निर्ममता के साथ, सबके सामने, उसका मुखौटा उतार फेंकता है - "सिर उठा कर/भूल मत जाना/जिसके समीप बैठे हो/……उनका अन्तःमन जल रहा है/ स्वर्ण अभिजात्य मनसिकता की तपिश से/ ……तुम्हारे जाते ही/ चारदीवारी पर रख दिया जाएगा/ घर से बाहर/ तुम्हारी चाय का/ ………जूठा कप।"
वादों-प्रतिवादों और सिद्धान्तों से बहुत दूर, सारी बौद्धिकताओं से परे, आदिवासी ज़िन्दगियों के संघर्ष की ऐसी त्रासदी को ही बयान करती है, इस संग्रह की एक कविता 'पत्थर पर बनी लक़ीर'। इस संघर्ष को देखते हुए, सबकुछ जानते हुए भी, न हम उनके लिए कुछ कर पाते हैं और न ही हम उन्हें उनके परिवेश में अपनी तरह जीने की आज़ादी ही दे पाते हैं। तमाम व्यर्थ की बहसों के निष्कर्ष में, कुछ भी ऐसा नहीं निकल पाता, जो इस 'पत्थर पर बनी लक़ीर' को मिटा सके, जो सबको एक पूरी और निश्चिन्त साँस लेने की आज़ादी दिला सके - "पत्थर पर बनी लक़ीर/मिटाए नहीं मिटती/ अमर हो जाती है लक़ीर/बनकर एक बार पत्थर पर/ ……वर्षों बाद भी यह मिलेंगी/उन इमारतों के खण्डहरों में/ जहाँ छाई होंगी वीरानियाँ/……थारू ज़िन्दगी भी एक/पत्थर पर बनी लक़ीर है।" (थारू - आदिवासी)
सुधीर अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वर्ग के अन्तःमन पर सदियों से बने घाव जब नासूर बन जाते हैं, तो ऊपरी तौर पर महज़ कुछ नौकरियों में आरक्षण देकर, कुछ कपड़े-किताबें और वज़ीफ़े बाँटकर ……या सिर्फ़ उन्हें प्यार से हरिजन कहकर कुछ भी नहीं बदला जा सकता है। अगर कुछ बदलना है तो वह है हमारे वर्तमान समाज, प्रशासन, हमारी राजनैतिक व्यवस्था और हमारे संविधान की उस वर्ग के लिए सोच। अगर उनको कुछ देना है तो वह है उनका मनोबल, उनका सदियों पहले छीना गया आत्म सम्मान। फिर उन्हें तुम्हारे उपकार की आवश्यकता न होगी। वह स्वंय खड़े हो सकेंगे। अपनी आँखों से देख सकेंगे अपना और इस दुनिया का सच - "मैं परिंदा/ दूसरों की उड़ान देख/उड़ने की कोशिश में/गिर गया पथरीली धरा पर/क्योंकि भूल गया था/पंख काटे थे किसी ने/ सदियों पहले।"
दलितों के सदियों के शोषण का सच्चा दस्तावेज़ हैं सुधीर सागर की कविताएँ।
- विवेक मिश्र -

Jul 21, 2010

शब्दों का कोहरा - वीरभद्र कार्कीढोली




कविता संग्रह - शब्दों का कोहरा
कवि - वीरभद्र कार्कीढोली
मूल नेपाली से अनुवाद - खडगराज गिरी
प्रकाशक - दोभान प्रकाशन, सिच्छे गान्तोक,
'शब्दों का कोहरा' वीरभद्र कार्कीढोली की मूलतः नेपाली में लिखी गई कविताओं के हिन्दी अनुवादों का संग्रह है। वीरभद्र एक ऐसे कवि हैं जो नेपाली, हिन्दी, अंग्रेज़ी और असमी में एक साथ लिखते हैं। उनके अभी तक सात कविता संग्रह एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कार्कीढोली के लिए ज़िंदगी और कविता दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो "ज़िंदगी से अलग हम कोई दूसरी यात्रा के यात्री नहीं हैं। दरअसल हो ही नहीं सकते। ज़िंदगी से अलग कोई ज़िंदगी नहीं है। वस्तुतः ज़िंदगी के ही ईर्द-गिर्द ज़िंदगी की तलाश कर रहे हैं हम। कोई हँसता नहीं है ख़ुशी से, आनन्द से। हँसने वाले सभी रो रहे हैं। अन्दर ही अन्दर अपनी अन्तर पीड़ा से।"
कार्कीढोली बदलाव के कवि हैं। ज़िंदगी में और कविता में, हर समय कुछ नया बोना चाहते हैं। वर्जनाओं से, रूढ़ियों से मुक्त होने की एक कोशिश करना चाहते हैं -
कई दिन हुए
एक ही भजन दोहरा रहे हैं लोग-
इस शहर के प्रसिद्ध मन्दिर में,
भीड़ चाहती है नए भजन सुनना
पर मन चाहा भजन सुने बिना ही
घनी रात्रि में
दिया बुझा कर
बेचारे पुजारी ने आत्मह्त्या कर ली
प्रभु के मन्दिर में ही।
कार्कीढोली की कविताएँ सतत संघर्षों और नई यात्राओं की कविताएँ हैं। एक ऐसे संघर्ष की कविताएँ जो देश, काल, पात्र बदलने पर भी समाप्त नहीं होता। बस मुखौटे बदलता है।
मैं तो हिमालय देखने आया था
तुम्हारे भीतर का
भरा हुआ और पिघला हुआ
देखूँगा सोचा था
पर ऊँचाईयाँ आँकने
नहीं आया था मैं………
बहुत ऊँचाई तक चला हूँ
और अभी उतना ही चलना है…
……पर पुनः मैं वही ग़लती दोहराने
उसी जगह आ पहुँचा।
फिर उसी जगह आ पहुँचा !!
बाज़ारवाद की आँधी में ध्वस्त होती मान्यताओं के बीच लगातार शोषन का शिकार होते आदमियों की भीड़ में से ही एक कवि भी है जो डर रहा है अपने लिए, अपने जैसे और लोगों के लिए और डर रहा है ध्वस्त होती आस्थाओं और जीवन मूल्यों के लिए -
पक्षी अब तक नहीं लौटे
एक-एक कर गिर रहें हैं पत्ते
हवा भी नहीं बह रही है ख़ूब!
गिरने को है वह पहाड़!
गिर सकता है : किसी रात, किसी दिन
या नहीं तो शाम को
खड़ी थी वहीं पर मेरी भी आस्थाएं!
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताओं में जीवन के नैराश्य का चरम है। जीवन के दुखों की चमक है और सन्नाटे में भारी-भरकम पहाड़ों के नीचे दबी कई अनसुनी चीख़ें हैं, जिन्हें ध्यान से जोड़कर सुनने पर एक ऐसी कविता बनती है जो समूची मानव जाती के दर्द का, उसकी पीड़ा का, उसके आर्तनाद का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी कविताएँ समस्याओं के उत्तर नहीं हैं, बल्कि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों की प्रतिध्वनियाँ हैं। उन्हें सुनकर अगर कोई जवाब आपको सूझे तो कवि को लिखियेगा।
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताएँ शीघ्र ही आप 'काव्यान्चल' पर पढ़ सकेंगे। वह अपने परिवार के साथ गैंगटॉक, सिक्किम में रहते हैं।
- विवेक मिश्र -

Jul 7, 2010

'सरस्वती सुमन' - दोहा विशेषांक



'सरस्वती सुमन' त्रैमासिक पत्रिका का दोहा विशेषांक दोहों को उनकी पूरी समग्रता के साथ पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। पत्रिका के संपादक आनंद सुमन सिंह तथा अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' हैं। पत्रिका में हिन्दी काव्यधारा में दोहों का इतिहास, उनके प्रकार, उनका महत्व एवं उनके गुणों को उजागर करते लेख एवं साक्षात्कार हैं, जिसमें अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' की वरिष्ठ कवि गोपाल दास नीरज एवं सहित्यकार देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' से की बात-चीत, दोहों के विषय में चर्चा को नए आयाम देती है। दोहों के प्रकारों पर प्रकाश डालता डॉ राम स्नेही लाल शर्मा 'यायावर' का लेख नए दोहाकारों के लिए विशेषकर पठनीय एवं संग्रहणीय है। दोहों में मात्राओं के महत्व को बताता चंद्रपाल शर्मा का लेख भी शोधपरक है।

विशेषांक में संत दादू के दोहों से लेकर नई पीढ़ी के लगभग 125 दोहाकारों को शामिल किया गया है। इससे स्वतः ही दोहों की यात्रा एवं विकास का भान हो जाता है।

यूँ तो विशेषांक में वर्तमान समय के रचनाकारों को ही प्रमुखता से छापा गया है, परन्तु दोहों की विरासत की चर्चा हो और कोई संत कबीर को नज़र अंदाज़ करे, यह बात खलती ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे दोहों की चर्चा में कबीर की अनदेखी किसी भी तरह गले नहीं उतरती। शायद ही कोई रचनाकार यह भूल सकता हो कि हिन्दी कविता के इतिहास में कबीर और दोहे एक-दूसरे के पर्याय हैं।

विशेषांक के मुख्य पृष्ठ पर छपा चित्र विशेषांक की सामग्री के कतई अनुकूल नहीं है, जबकी भीतर के पृष्ठों पर छपे रेखाचित्र जो अतिथी संपादक अशोक 'अंजुम' के हैं, बहुत प्रभावशाली एवं सामग्री के अनुकूल हैं। अंक में पिछले दशक में छपी महत्वपूर्ण सतसईयों की भी अनदेखी की गई है, जिससे धर्म प्रकाश गुप्त जैसे बड़े दोहाकार अंक से बाहर हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कवि 'त्रीफ़ला' जो दोहों और सतसईयों के लिए जाने जाते हैं, उनकी सुध भी नहीं ली गई है। उसका कारण अधिकांश रचनाकारों का चुनाव मंचीय कवियों में से ही किया गया है, जिससे अधिकांश दोहों में विषयों की पुनरावृत्ति का दोष तो आया ही है, साथ ही कुछेक दोहे बहुत हल्के, चलताऊ और अर्थों में बहुत उथले प्रतीत होते हैं। विशेषांक के अंत में दिए दोहे से ही यदि यह बात करें तो यूँ होगी -

सब कुछ उल्टौ हो गयौ, भयौ बुरौ सब फेर ।

तुलसी, सूर, कबीर सब देख रहे अंधेर ।

दोहों को अपनी तुकों, मात्राओं और लय के कारण ही नहीं बल्कि अपने भीतर छुपे गूढ़ दर्शन और जनहित के लिए दिए गए संदेशों और शिक्षाओं के लिए भी प्रमुखता से जाना जाता है। आज दोहों का प्रयोग हल्के, चलताऊ जुमलों या नारों की तरह तालियाँ बटोरने के लिए हो रहा है। दोहा दरअसल दर्शन को समेटकर उसे संक्षिप्त कर जन साधारण तक पहुँचाने के लिए लिखा जाता था, इसकी भाषा लोक भाषा होती थी पर इसके अर्थों की कई पर्तें होती थीं। दोहों के गुणों की इस कसौटी पर कुछ ही दोहाकार आज खरे उतरते हैं। विशेषांक के कुछ दोहे -

इसक अलद की जात है, इसक अलह का अंग ।

इसक अलह औजूद है, इसक अलद का रंग ॥ -संत दादू-

अभी नहाया है छुरा, लगी सड़क पर भीड़ ।

घबरा कर दुखने लगी, बड़े-बड़ों की रीढ़ ॥

राजपथों पर खो गया, जीवन का भूगोल ।

ख़ाका सब पूरा हुआ, ख़ास बात है गोल ॥ -म ना नरहरि-

देख-देख पर्यावरण, बहा रहा है नीर ।

ताजमहल किससे कहे, अपने मन की पीर ॥

आसमान को छू रहे, आलीशान मकान ।

तरस रहे हैं धूप को, घर के रोशनदान ॥ - अंसार कंबरी-

बेशक मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इन्कार ।

पहले अपने बाट तो जाँच-परख ले यार ॥ -हस्तीमल हस्ती-

अग्निपरीक्षा भी कहाँ जोड़ सकी विश्वास ।

युग बीते, बीता नहीं, सीता का वनवास ॥ -सरिता शर्मा-

अर्थहीन कुछ ने कहा, कुछ ने अर्थातीत ।

अव्याख्येय रहस्य सा जीवन हुआ व्यतीत ॥ -शिवओम अंबर-

पत्रिका छः वर्षों में चवालीस अंक निकाल चुकी है। लगभग पौने दो सौ पृष्ठों का दोहों पर केन्द्रित यह अंक पाठकों को कई सिद्ध दोहाकारों की रचनाओं से रूबरू होने का मौक़ा देता है। नए दोहाकारों को सीखने के लिए अंक में पर्याप्त सामग्री है।

अंक - 'सारस्वतम', 1-छिब्बर मार्ग, देहरादून - 248001 से मंगाया जा सकता है।

- विवेक मिश्र -

Jun 29, 2010

'युद्धरत आम आदमी'













यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि 'युद्धरत आम आदमी' मात्र पत्रिका नहीं है। यह एक आंदोलन है। एक ऐसा आंदोलन जो तमाम आंदोलनों, अभियानों और क्रांतियों में नज़र अन्दाज़ किया जाता रहा। हमेशा जिसे धकिया कर वार्ताओं से, योजनाओं से, किताबों और पत्रिकाओं से बाहर निकाला जाता रहा। यह ऐसा आंदोलन है, जो कभी किसी राष्ट्रीय पार्टी के एजेंडे में प्रमुखता नहीं पा सका। तथाकथित बुद्धिजीवीयों ने, साहित्यकारों ने भी इसे छूने से परहेज़ किया। पत्र-पत्रिकाओं में, सहित्य में हज़ारों-लाखों की तदाद में रोज़ छपने वाले पन्नों में इस विषय को हाशिए तक पर जगह नहीं मिली।
रमणिका फ़ाउन्डेशन ने अपने तमाम प्रकाशनों के साथ 'युद्धरत आम आदमी' के माध्यम से समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे, अपनी जगह ढूँढ रहे लोगों को एक आवाज़ दी।
'युद्धरत आम आदमी' का पूर्वांक-101, 2009 - "सृजन के आईने में - मल-मूत्र ढोता भारत" जिसका संपादन रमणिका गुप्ता तथा सुशीला टांकभौरे ने किया है, जो कि अंक-103 (अप्रेल-जून, 2010) के साथ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
जैसा कि अंक के मुख्य पृष्ठ से ही बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि यह अंक बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी दुराव-छुपाव के सीधे-सीधे उन लोगों की बात कर रहा है, जो सदियों से रोज़ सुबह उठकर अपने ही जैसे दिखने वाले इन्सानों का मल-मूत्र समेटने और उसे अपने सिर पर ढोकर घर, गाँव, शहर से दूर ले जाकर फेंकने जैसे अमानवीय काम को अंजाम देते हैं। यह काम करते हाथ एक दिन के लिए रुक जाएँ तो कितने ही घरों की सुबह भी ठहर जाए। आज इक्कीसवीं सदी में विकास का दम भरते, विश्व शक्ति बनने का सपना देखते भारत की हवा उस समय निकल जाती है, जब कोई इन्सान अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने जैसे काम को आज भी करने के लिए विवश दिखाई देता है और ऐसे लोगों की संख्या दस-बीस या सौ-दो सौ नहीं बल्कि हज़ारों-लाखों में है। आज भी ग्रामीण भारत में सैंकड़ों गाँवों-कसबों में हज़ारों परिवार रोज़गार के विकल्प के अभावों में, इस काम को करने के लिए मजबूर हैं।
अंक का संपादन पूर्णतया निष्पक्ष होकर निर्भीकता से किया गया है। अंक में विषय से संबन्धित दलित लेखन को उसकी अन्तर चेतना के साथ समाहित किया गया है।
आवरण चित्र एंव कला निर्देशन डॉ सुधीर सागर का है। पत्रिका का मुख्य पृष्ठ ही विषय के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। अंक में हिन्दी के साथ मराठी, गुजराती, तेलुगू के लेखकों को भी स्थान दिया गया है। अंक में कहानी, कविता, पुस्तकों के अंशों, समीक्षात्मक आलेख एंव विवेचनात्मक मूल्यांकनों को, नाटक एंव लघुकथाओं को शामिल किया गया है।
रमणिका फ़ाउन्डेशन के इस प्रयास से अपनी जगह ढूँढते विषय एंव उस पर हो रहे लेखन और चिन्तन को पर्याप्त जगह मिली है। अंक की चर्चा भी रही। समस्या में गहराई से उतरने और उसे समझने का उन लोगों को भी मौक़ा मिला जो इस विषय में सोचने से पहले ही छी-छी कहके नाक पर रूमाल रखकर वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए इसे पूर्वजन्मों का लेखा कह कर रास्ता बदल लेते हैं।
पत्रिका जो अब पुस्तक के रूप में है, उसने दलितों को सभी भुलावों से दूर हटकर वर्ण व्यवस्था की थोथी पट्टी न पढ़कर, उसे जलाकर नए भविष्य की नींव रखने का आह्वान करती है। नई व्यवस्था रचने को उकसाती है और जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या स्वंय को दलित समझकर इस कार्य से जुड़े रहने की थोथी दलील को सिरे से खारिज करती है। दलित चेतना को जगाने की दिशा में यह एक मज़बूत क़दम है।
यह बात अजय नावरिया अपनी कविता में कुछ ऐसे कहते हैं :-
"शब्द थे, बहुत पहले से
पर मेरी मुट्ठीयों में नहीं थे
कस कर बाँध दिया था
उन्हें मेरी आँखों पर
ताकि देख न सकूँ उन के भीतर
अर्थ की चिल्लाती रोशनी को
बेशक, मुट्ठी में आते ही
चकाचौंध हुई आँखें, पल भर को
……फिर बन गया वह
झरझर झरता झरना
……ये मेरी हथेलियों पर
पंख लगाए उड़ते शब्द
ये समूचे अस्तित्व में सेंध लगाते
इनके असीमित अर्थ ……
असीमित शब्दों को उघाड़ता नए आयाम रचता, चेतना का प्रकाश फैलाता यह अंक, सचमुच जड़ मान्यताओं की आँखें चुँधिया देगा। इसकी रोशनी का स्वागत किया जाना चाहिए।
- विवेक मिश्र -




Jun 17, 2010

क्षितिज का सीमान्त

काव्य संग्रह - क्षितिज का सीमान्त
कवयित्रि - डॉ कौशल्या गुप्ता
प्रकाशक- शिल्पायन
मूल्य - 150/-
कौशल्याजी की कविताएँ किन्हीं विशेष समस्याओं, उनके कारणों या उनके समाधानों के आस-पास नहीं बुनी गई हैं। ही उनमें वादों, प्रतिवादों और सिद्धान्तों का निरूपण या खण्डन है। उनकी कविताएँ जीवन के अगाध अनुभवों की वे झाकियाँ हैं जिनमें कवि की दृष्टि एक द्रष्टा की है। उनकी कविताओं का कोई पक्ष या विपक्ष नहीं है। वे एक नदी की भाँति बहती हैं और अपने दोनों किनारों को भिगोती चलती है। इसीलिए उनकी कविताओं में दो अलग-अलग किनारे तो दिखते हैं पर धारा निष्पक्ष रहकर एक ही समय में दोनों किनारों को छूती है।
उनकी कविताओं में एक कभी न ख़त्म होने वाली ताज़गी है। उनकी कई कविताओं ने कई दशकों का सफ़र बड़े धैर्य से तय किया है। जब मैंने उनकी रचनाओं के पिटारे को खोला, तो पाया कि उसमें कितने ही रत्न छुपे हैं। बहुत कोशिश के बाद भी उनमें से सबको इस संग्रह में तो नहीं रखा जा सका, पर निश्चय ही उनकी कुछ श्रेष्ठ रचनाएँ 'क्षितिज का सीमान्त' में आपको क्षितिज का सीमान्त स्पर्श करती दिखेंगी।
- विवेक मिश्र -

Jun 16, 2010

सच्ची संवेदनाओं की ईमानदार कविताएं

कविता संग्रह - शब्द उस पार के
कवि - शिवचरण सिंह 'पिपिल
प्रकाशक - शिल्पायन
मूल्य - 150/-


शिवचरण सिंह जी का काव्य-संकलन उनके हृदय में गहरे तक पैठ किए बैठे लोक संस्कारों और समाज के वंचित वर्ग के लिए सच्ची संवेदनाओं से उपजे भावों के लोक गीतों की धुनों में ढलने से बना उनके गीतों की भाषा माटी की महक, नीम की छाँव, गाँव की पगडंडियों में उड़ती धूल और अन्न के अभाव में बुझे चूल्हे से उठती भाप से बनती है। इनका व्याकरण क़लम-किताब छोड़कर मज़दूरी करते हाथों से, किसानों के घरों में भूखे-बिलखते अबोधों की चीख़ से और कमर तोड़ मेहनत करके आधे पेट खाकर घर की इज़्ज़्त ढाँकती, मुस्कुराती स्त्री की आँखों से छलछला उठे आसुँओं से निर्मित होता है।
शिवचरण जी ने बाल मज़दूरों को पुनः क़लम-किताब थमाने और उनको पुनः उनके घर-परिवार से मिलाने में अपने कार्यकाल में महत्वपूर्ण काम किया है और आज भी वह कई सामाजिक संस्थाओं साहित्य के माध्यम से उन बच्चों के लिए निरन्तर काम कर रहे हैं। उनकी कविताओं और गीतों में जनगीत बनने की पूरी ताक़त है। वे आम आदमी की भाषा में आम आदमी की बात कहते हैं, जो शोषित और दलित वर्ग के ज़ख़्मों पर मरहम और सत्ता और शासक के मुँह पर तमाचे का काम एक साथ करती है। वह ग़रीबी और उससे जुड़े छद्म सामाजिक सरोकारों सरकारी योजनाओं और झूठे विकास के दावों की कलई खोल कर रख देते हैं और कई स्थानों पर तो वह इसके लिए काव्य की भाषा और उसकी लय ही नहीं अपने कवित्व को भी उठाकर ताक पर रख देते हैं, पर उनके कथ्य मे सच्चाई है, ईमानदारी है और इन दोनों को आगे भी बनाए रखने की मंशा है।
उनकी कविता के नायक सिर पर मोर-पंखी सजाए, हाथ में बंसी लिए, सोने की पायल की छम-छमके साथ आँगन में खेलते बाल-कृष्ण नहीं हैं। उनकी कविता के नायक रैंता, पैंता और पलैंता जैसे मिट्टी-कीचड़ में सने सड़कों पर नंग-धड़ंग दौड़ते, कचरे से खाना ढूँढ़ते वे बच्चे हैं जिनके पैदा होने के बाद उनके माँ-बाप के पास उनका नाम रखने की फ़ुर्सत भी नहीं रही। उन्हें किसी ने मुस्कुराते हुए एक पल रूक कर नहीं देखा, जिन्होंने पेट भरने के लिए कब मज़दूरी शुरू की उन्हें ख़ुद भी याद नहीं। शिवचरण जी की आवाज़ को चहुँओर से समर्थन मिले, समाज से बाल मज़दूरी समाप्त हो। शोषित महिलाओं में स्त्री सशक्तिकरण की आवाज़ बुलन्द हो। इन गीतों को गुनगुनाता कोई बंजारा कभी आपको किसी रास्ते में मिले, ऐसी इच्छा के साथ, इस संग्रह के प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ।
-विवेक मिश्र