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Sep 17, 2010

गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ -'आज का दुर्वासा' कहानी संग्रह


गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ हैं सन्तोष खन्ना के कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' में।
समीक्षक - विवेक मिश्र

www.vivechna.blogspot.com






कृति - आज का दुर्वासा
विधा - कहानी
कहानीकार- सन्तोष खन्ना
प्रकाशक - भारत ज्योति प्रकाशन
मूल्य - रू 250/-

हिन्दी कहानी पूरी सदी का सफ़र तय कर चुकी है। अक्सर ही कहानी को लेकर सामाजिक बदलावों और नई क्रान्तियों की घोषणा भी की जाती है, लेकिन कईयों बार इस पर सवाल भी उठे हैं और इसे कटघरे में भी खड़ा किया जाता रहा है। अपने भीतर-बाहर तमाम सवालों के जवाब ढूँढती, आगे बढ़ती हिन्दी कहानी का स्वरूप बदलता रहा है। आधुनिक हिन्दी कहानियों पर रूसी कहानियों का गहरा असर दिखाई देता है, जिसमें उसकी अच्छाईयाँ और बुराईयाँ बराबर से घुली-मिली दिखाई देती है। परन्तु अस्सी और नब्बे के दशक में कई कहानीकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने इस प्रभाव को पीछे छोड़ते हुए अपने ही अन्दाज़ में अपने पूरे देसीपन के साथ कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियाँ वास्तविक भारतीय जीवन के बहुत निकट हैं और उसकी प्रस्तुति भी कहानी की घटनाओं के अनुरूप है। इनमें देसी बात विदेशी ढंग से या उधार के शिल्प में ढालकर कहने की सनक नहीं है। ऐसी ही एक लेखिका हैं सन्तोष खन्ना, जो कवयित्री और संपादिका तो हैं ही, अपने समय की श्रेष्ठ कहानीकार भी हैं।

सन् 2009 में सन्तोष खन्ना का कहानी संग्रह 'आज का दुर्वासा' प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनकी लगभग अट्ठारह छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं। संकलन की पहली कहानी 'आज का दुर्वासा' आज के समय की, समाज की तमाम पर्तें उघाड़ती एक बेबाक कहानी है, जो आज के समय को नंगा करके, हमारे प्रगति के सारे दावों की पोल खोल के रख देती है। इस कहानी को पढ़ते हुए उदय प्रकाश की 'तिरिछ' याद जाती है। 'तिरिछ' में शहर की निर्ममता का शिकार एक भोला-भाला ग्रामीण है, पर यहाँ यह सब कुछ शहर में रहने वाले, एक ऐसे व्यक्ति के साथ बीता है, जिसका जीवन शहर में ही बीता है, पर फिर भी यह शहर, यह तन्त्र उसके लिए एक निष्ठुर और विकराल पिशाच सिद्ध होता है, जो उससे उसका नाम, घर, सम्मान, उसकी अस्मिता सब कुछ छीन लेता है, यहाँ तक कि उसकी बुद्धि, विवेक भी। सब कुछ खो चुकने के बाद भी एक बात जो उसके चरित्र में शेष रह जाती है, वह है उसका आक्रोश और वही उसे आज का दुर्वासा बना देता है। कहानी का अन्तिम वाक्य महानगरों में बसे पूरे संवेदनाहीन समाज को दिया गया उस आदमी का श्राप है, जिससे इस शहर ने उसका सब कुछ छीन लिया है। वह कहता है "तुम्हारे बच्चे तुम्हें पहचानना भूल जाएँ……"।

सन्तोष खन्ना की कहानियाँ हमारे आस-पास के जीवन में बिखरे तमाम रंगों को समेटती हैं, इसमें इतिहास, वर्तमान और कहीं-कहीं भविष्य की झाँकिया भी देखने को मिलती हैं। वह प्लॉट को बड़े सरल ढग से शुरू करके, बड़ी सहजता से बुनती हैं। कहानियाँ पढ़ते वक़्त लगता है हम कहानियाँ देख रहे हैं। पात्र आपस में ही नहीं बल्कि पाठक से भी संवाद कर रहे हैं। ऐसी ही एक कहानी है 'नास्तिक' जिसमें बड़ी सहजता से धर्म और अध्यात्म जैसे जटिल विषय की गूढ़ गुत्थियों को कहानीकार ने एक छोटी-सी कहानी में बड़े निर्दोष ढंग से सुलझाया है। अच्छी बात यह है कि कहानीकार स्वंय उपदेशक नहीं है। वह स्वंय पाठक के साथ अपनी समस्याओं से जूझ रहा है। वह स्वंय भी कई अनसुलझे सवालों के झुरमुट में खड़ा है, और यही बात सन्तोष खन्ना को अन्य कहानीकारों से अलग करती है।

'पंसेरी' संग्रह की एक और छोटी कहानी है, जो स्त्री शोषण की व्यथा को एवं समाज द्वारा स्त्री को वस्तु के रूप में देखे जाने की वृत्ति को दर्शाती है।

'प्रायश्चित' कहानी में संतोष ने कथा की एक नई दहलीज़ बनाई हैवह कथा के विराट विस्तार को अपने में समेटे हुए है, जिसकी अलग से चर्चा की जानी चाहिए।

'बेबसी', 'साझेदारी', 'बिना टिकिट' और बूट पालिश संग्रह की अन्य अच्छी कहानियाँ हैं।

सन्तोष खन्ना की हरेक कहानी गहरे सामाजिक सरोकारों की कहानी है। हरेक कहानी सरल ढंग से कही गई परन्तु गहन संवेदनाओं और जटिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करती, मानवीय मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करती है। संग्रह की कहानियाँ स्वतंत्र रूप से एवं विस्तार से एक साहित्यिक चर्चा की माँग करती हैं। अवसर एवं मंच मिलने पर ऐसा अवश्य संभव होगा। कहानियों के भीतर छुपी लेखिका की संवेदनाएँ पाठक के भीतर गहरे में अपनी पैंठ बनाने और अपनी छाप छोड़ने में सफ़ल होंगी, इसी विश्वास के साथ। सन्तोष जी को संग्रह के लिए शुभकामनाएँ।

- विवेक मिश्र -
मोब: 9810853128

Aug 10, 2010

कंदील की रोशनी में, सच को उघाड़ती कविताएं - विवेक मिश्र















कंदील की रोशनी में, सच को उघाड़ती कविताएं - विवेक मिश्र
(www.vivechna.blogspot.com)


स्त्री विमर्श के घेरे में आती तमाम चिन्ताओं को रेखांकित करती, दोहराती, उनका पुनःपाठ करती और अब उन चिन्ताओं के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने के लिए, स्त्रियों से आह्वान करती, एक मुखर स्वर की कविताएं हैं, कवयित्री कुन्ती के कविता संग्रह 'अंधेरे में कंदील' में। वह कहती हैं -
अब बीती बातों को
भुलाने की बात नहीं
ज़रूरत है/ बार-बार दोहराने की
कुन्ती कथ्य और शिल्प के स्थापित फ़ॉर्मेट के ढर्रे में चल कर कविताएं नहीं लिखती। वह बिना किसी वाग्जाल के, सीधे नारी अन्तःकरण की पीड़ा को व्यक्त करती हैं -
तुम कहते हो कविता
तो कह लो
यह आर्तनाद है! ……उस स्त्री का
जिसे लाया गया कई बार
कसाईखाने में!
कुन्ती ने अपनी कविताओं से स्त्री विमर्श के विभिन्न अंधियारे कोनों में, नारी शोषण के ख़िलाफ़ यहाँ-वहाँ, जलती-बुझती रोशनी को समेट कर, एक कंदील जलाई है, जो धीरे-धीरे मशाल में तब्दील होती लगती है -
हज़ारों अंधेरे
अपने आप में समेटे हुए
ठिठुरते हाथों में, थामे हैं
वो जगमगाता कंदील
पर उसकी एक भी किरण
उस पर नहीं पड़ती।
इस संग्रह में कुन्ती ने न केवल दलित, शोषित, अनपढ़ और पिछड़ी महिलाओं की समस्याओं की बात की है, बल्कि पढ़ी-लिखी, कामकाजी, नए समय और विकास के साथ तालमेल बिठाती महिलाओं के मन में भी झाँका है -
यूँ तो कहने को तुमने
मेरे जीवन के
अधिकतम पृष्ठ पढ़े हैं।
फिर भी यही कहते रहे
कि नहीं समझ पाया तुम्हें अब तक
………पर तुमने
पढ़ना ही मुझे
अंतिम पृष्ठ से शुरू किया था।
इस संग्रह की कविताओं में विविधता है पर इनके केन्द्र में नारी जीवन की समस्याएं, उसका दुख-दर्द और कहीं-कहीं उसमें दबी-छुपी बदलाव की एक हल्की सी उम्मीद है। पर अभी भी वह, ये बदलाव अपनी स्त्री मन की कोमलता के साथ, अपने रिश्तों और उनके वर्तमान सामाजिक ताने-बाने के साथ ही पाना चाहती है। वह चाहती है उसके आस-पास का वातावरण, समाज, परिवार, व्यक्ति सब इस बदलाव की ज़रूरत को महसूस करें। न कि वह अकेली परिवर्तन की ओर, इन सबको पीछे छोड़ती हुई, आगे बढ़े। इसीलिए वह कहती है -
समय के स्लेट पर/
वर्तमान की क़लम से तुम/
इतना भर लिख दो/
कि रोशनी तेरे लिए भी है/बस/
सुबह तक इन्तज़ार कर।
कुन्ती की कविताओं में सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद है। उनकी उम्मीद, बदलाव की मशाल बने। इसी इच्छा के साथ………

- विवेक मिश्र -
(www.vivechna.blogspot.com)

Aug 7, 2010

सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं


सदियों पहले काटे गए पंखों का दर्द कहती हैं, सुधीर सागर की कविताएं
- विवेक मिश्र (www.vivechna.blogspot.com)






डॉ सुधीर सागर के कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो' की कविताएँ, एक संकटग्रस्त समाज के भीतर, निरन्तर संघर्षरत, उस वर्ग विशेष की पीड़ा को स्वर देती कविताएँ हैं, जिसे देश और समाज के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा न केवल नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उसकी उपस्थिति और अस्तित्व को ही सिरे से नकारा जाता रहा। आज इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध में जहाँ हर छोटा-बड़ा रास्ता हमें खींचकर बाज़ार की ओर ले जा रहा है। हर चीज़ की क़ीमत तय हो चुकी है। विचार से लेकर व्यक्ति तक, रूपहली पैकिंग में, बिकने के लिए बाज़ारों में सजे हैं। तेज़ी से बदलते इस देश में, एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी वहीं खड़ा है जहाँ सदियों पहले उसे, आँखों पर धर्म और वर्ण व्यवस्था की पट्टी बाँध कर, सदा-सदा के लिए, अंधेरे में, सड़ांध में पीढ़ी दर पीढ़ी एक अभिशप्त जीवन जीने के लिए धकेल दिया गया था - "खण्डित शिलाओं की तरह/मौजूद हैं तन-मन पर/लहुलुहान ख़रोंचें/……यह जाति कोई विशेष प्रजाति का जानवर नहीं/ये पूरी मानव जाति का/ चिंदी-चिंदी हो चुका/ एक चीथड़ा है।"
सुधीर सागर का कवि क्षद्म विकास और परिवर्तन के पीछे छुपे ढोंग को, उदारता के स्वांग को अच्छे से समझता है और उसके चेहरे से, पूरी निर्ममता के साथ, सबके सामने, उसका मुखौटा उतार फेंकता है - "सिर उठा कर/भूल मत जाना/जिसके समीप बैठे हो/……उनका अन्तःमन जल रहा है/ स्वर्ण अभिजात्य मनसिकता की तपिश से/ ……तुम्हारे जाते ही/ चारदीवारी पर रख दिया जाएगा/ घर से बाहर/ तुम्हारी चाय का/ ………जूठा कप।"
वादों-प्रतिवादों और सिद्धान्तों से बहुत दूर, सारी बौद्धिकताओं से परे, आदिवासी ज़िन्दगियों के संघर्ष की ऐसी त्रासदी को ही बयान करती है, इस संग्रह की एक कविता 'पत्थर पर बनी लक़ीर'। इस संघर्ष को देखते हुए, सबकुछ जानते हुए भी, न हम उनके लिए कुछ कर पाते हैं और न ही हम उन्हें उनके परिवेश में अपनी तरह जीने की आज़ादी ही दे पाते हैं। तमाम व्यर्थ की बहसों के निष्कर्ष में, कुछ भी ऐसा नहीं निकल पाता, जो इस 'पत्थर पर बनी लक़ीर' को मिटा सके, जो सबको एक पूरी और निश्चिन्त साँस लेने की आज़ादी दिला सके - "पत्थर पर बनी लक़ीर/मिटाए नहीं मिटती/ अमर हो जाती है लक़ीर/बनकर एक बार पत्थर पर/ ……वर्षों बाद भी यह मिलेंगी/उन इमारतों के खण्डहरों में/ जहाँ छाई होंगी वीरानियाँ/……थारू ज़िन्दगी भी एक/पत्थर पर बनी लक़ीर है।" (थारू - आदिवासी)
सुधीर अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वर्ग के अन्तःमन पर सदियों से बने घाव जब नासूर बन जाते हैं, तो ऊपरी तौर पर महज़ कुछ नौकरियों में आरक्षण देकर, कुछ कपड़े-किताबें और वज़ीफ़े बाँटकर ……या सिर्फ़ उन्हें प्यार से हरिजन कहकर कुछ भी नहीं बदला जा सकता है। अगर कुछ बदलना है तो वह है हमारे वर्तमान समाज, प्रशासन, हमारी राजनैतिक व्यवस्था और हमारे संविधान की उस वर्ग के लिए सोच। अगर उनको कुछ देना है तो वह है उनका मनोबल, उनका सदियों पहले छीना गया आत्म सम्मान। फिर उन्हें तुम्हारे उपकार की आवश्यकता न होगी। वह स्वंय खड़े हो सकेंगे। अपनी आँखों से देख सकेंगे अपना और इस दुनिया का सच - "मैं परिंदा/ दूसरों की उड़ान देख/उड़ने की कोशिश में/गिर गया पथरीली धरा पर/क्योंकि भूल गया था/पंख काटे थे किसी ने/ सदियों पहले।"
दलितों के सदियों के शोषण का सच्चा दस्तावेज़ हैं सुधीर सागर की कविताएँ।
- विवेक मिश्र -

Jul 21, 2010

शब्दों का कोहरा - वीरभद्र कार्कीढोली




कविता संग्रह - शब्दों का कोहरा
कवि - वीरभद्र कार्कीढोली
मूल नेपाली से अनुवाद - खडगराज गिरी
प्रकाशक - दोभान प्रकाशन, सिच्छे गान्तोक,
'शब्दों का कोहरा' वीरभद्र कार्कीढोली की मूलतः नेपाली में लिखी गई कविताओं के हिन्दी अनुवादों का संग्रह है। वीरभद्र एक ऐसे कवि हैं जो नेपाली, हिन्दी, अंग्रेज़ी और असमी में एक साथ लिखते हैं। उनके अभी तक सात कविता संग्रह एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कार्कीढोली के लिए ज़िंदगी और कविता दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो "ज़िंदगी से अलग हम कोई दूसरी यात्रा के यात्री नहीं हैं। दरअसल हो ही नहीं सकते। ज़िंदगी से अलग कोई ज़िंदगी नहीं है। वस्तुतः ज़िंदगी के ही ईर्द-गिर्द ज़िंदगी की तलाश कर रहे हैं हम। कोई हँसता नहीं है ख़ुशी से, आनन्द से। हँसने वाले सभी रो रहे हैं। अन्दर ही अन्दर अपनी अन्तर पीड़ा से।"
कार्कीढोली बदलाव के कवि हैं। ज़िंदगी में और कविता में, हर समय कुछ नया बोना चाहते हैं। वर्जनाओं से, रूढ़ियों से मुक्त होने की एक कोशिश करना चाहते हैं -
कई दिन हुए
एक ही भजन दोहरा रहे हैं लोग-
इस शहर के प्रसिद्ध मन्दिर में,
भीड़ चाहती है नए भजन सुनना
पर मन चाहा भजन सुने बिना ही
घनी रात्रि में
दिया बुझा कर
बेचारे पुजारी ने आत्मह्त्या कर ली
प्रभु के मन्दिर में ही।
कार्कीढोली की कविताएँ सतत संघर्षों और नई यात्राओं की कविताएँ हैं। एक ऐसे संघर्ष की कविताएँ जो देश, काल, पात्र बदलने पर भी समाप्त नहीं होता। बस मुखौटे बदलता है।
मैं तो हिमालय देखने आया था
तुम्हारे भीतर का
भरा हुआ और पिघला हुआ
देखूँगा सोचा था
पर ऊँचाईयाँ आँकने
नहीं आया था मैं………
बहुत ऊँचाई तक चला हूँ
और अभी उतना ही चलना है…
……पर पुनः मैं वही ग़लती दोहराने
उसी जगह आ पहुँचा।
फिर उसी जगह आ पहुँचा !!
बाज़ारवाद की आँधी में ध्वस्त होती मान्यताओं के बीच लगातार शोषन का शिकार होते आदमियों की भीड़ में से ही एक कवि भी है जो डर रहा है अपने लिए, अपने जैसे और लोगों के लिए और डर रहा है ध्वस्त होती आस्थाओं और जीवन मूल्यों के लिए -
पक्षी अब तक नहीं लौटे
एक-एक कर गिर रहें हैं पत्ते
हवा भी नहीं बह रही है ख़ूब!
गिरने को है वह पहाड़!
गिर सकता है : किसी रात, किसी दिन
या नहीं तो शाम को
खड़ी थी वहीं पर मेरी भी आस्थाएं!
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताओं में जीवन के नैराश्य का चरम है। जीवन के दुखों की चमक है और सन्नाटे में भारी-भरकम पहाड़ों के नीचे दबी कई अनसुनी चीख़ें हैं, जिन्हें ध्यान से जोड़कर सुनने पर एक ऐसी कविता बनती है जो समूची मानव जाती के दर्द का, उसकी पीड़ा का, उसके आर्तनाद का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी कविताएँ समस्याओं के उत्तर नहीं हैं, बल्कि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों की प्रतिध्वनियाँ हैं। उन्हें सुनकर अगर कोई जवाब आपको सूझे तो कवि को लिखियेगा।
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताएँ शीघ्र ही आप 'काव्यान्चल' पर पढ़ सकेंगे। वह अपने परिवार के साथ गैंगटॉक, सिक्किम में रहते हैं।
- विवेक मिश्र -

Jul 7, 2010

'सरस्वती सुमन' - दोहा विशेषांक



'सरस्वती सुमन' त्रैमासिक पत्रिका का दोहा विशेषांक दोहों को उनकी पूरी समग्रता के साथ पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। पत्रिका के संपादक आनंद सुमन सिंह तथा अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' हैं। पत्रिका में हिन्दी काव्यधारा में दोहों का इतिहास, उनके प्रकार, उनका महत्व एवं उनके गुणों को उजागर करते लेख एवं साक्षात्कार हैं, जिसमें अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' की वरिष्ठ कवि गोपाल दास नीरज एवं सहित्यकार देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' से की बात-चीत, दोहों के विषय में चर्चा को नए आयाम देती है। दोहों के प्रकारों पर प्रकाश डालता डॉ राम स्नेही लाल शर्मा 'यायावर' का लेख नए दोहाकारों के लिए विशेषकर पठनीय एवं संग्रहणीय है। दोहों में मात्राओं के महत्व को बताता चंद्रपाल शर्मा का लेख भी शोधपरक है।

विशेषांक में संत दादू के दोहों से लेकर नई पीढ़ी के लगभग 125 दोहाकारों को शामिल किया गया है। इससे स्वतः ही दोहों की यात्रा एवं विकास का भान हो जाता है।

यूँ तो विशेषांक में वर्तमान समय के रचनाकारों को ही प्रमुखता से छापा गया है, परन्तु दोहों की विरासत की चर्चा हो और कोई संत कबीर को नज़र अंदाज़ करे, यह बात खलती ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे दोहों की चर्चा में कबीर की अनदेखी किसी भी तरह गले नहीं उतरती। शायद ही कोई रचनाकार यह भूल सकता हो कि हिन्दी कविता के इतिहास में कबीर और दोहे एक-दूसरे के पर्याय हैं।

विशेषांक के मुख्य पृष्ठ पर छपा चित्र विशेषांक की सामग्री के कतई अनुकूल नहीं है, जबकी भीतर के पृष्ठों पर छपे रेखाचित्र जो अतिथी संपादक अशोक 'अंजुम' के हैं, बहुत प्रभावशाली एवं सामग्री के अनुकूल हैं। अंक में पिछले दशक में छपी महत्वपूर्ण सतसईयों की भी अनदेखी की गई है, जिससे धर्म प्रकाश गुप्त जैसे बड़े दोहाकार अंक से बाहर हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कवि 'त्रीफ़ला' जो दोहों और सतसईयों के लिए जाने जाते हैं, उनकी सुध भी नहीं ली गई है। उसका कारण अधिकांश रचनाकारों का चुनाव मंचीय कवियों में से ही किया गया है, जिससे अधिकांश दोहों में विषयों की पुनरावृत्ति का दोष तो आया ही है, साथ ही कुछेक दोहे बहुत हल्के, चलताऊ और अर्थों में बहुत उथले प्रतीत होते हैं। विशेषांक के अंत में दिए दोहे से ही यदि यह बात करें तो यूँ होगी -

सब कुछ उल्टौ हो गयौ, भयौ बुरौ सब फेर ।

तुलसी, सूर, कबीर सब देख रहे अंधेर ।

दोहों को अपनी तुकों, मात्राओं और लय के कारण ही नहीं बल्कि अपने भीतर छुपे गूढ़ दर्शन और जनहित के लिए दिए गए संदेशों और शिक्षाओं के लिए भी प्रमुखता से जाना जाता है। आज दोहों का प्रयोग हल्के, चलताऊ जुमलों या नारों की तरह तालियाँ बटोरने के लिए हो रहा है। दोहा दरअसल दर्शन को समेटकर उसे संक्षिप्त कर जन साधारण तक पहुँचाने के लिए लिखा जाता था, इसकी भाषा लोक भाषा होती थी पर इसके अर्थों की कई पर्तें होती थीं। दोहों के गुणों की इस कसौटी पर कुछ ही दोहाकार आज खरे उतरते हैं। विशेषांक के कुछ दोहे -

इसक अलद की जात है, इसक अलह का अंग ।

इसक अलह औजूद है, इसक अलद का रंग ॥ -संत दादू-

अभी नहाया है छुरा, लगी सड़क पर भीड़ ।

घबरा कर दुखने लगी, बड़े-बड़ों की रीढ़ ॥

राजपथों पर खो गया, जीवन का भूगोल ।

ख़ाका सब पूरा हुआ, ख़ास बात है गोल ॥ -म ना नरहरि-

देख-देख पर्यावरण, बहा रहा है नीर ।

ताजमहल किससे कहे, अपने मन की पीर ॥

आसमान को छू रहे, आलीशान मकान ।

तरस रहे हैं धूप को, घर के रोशनदान ॥ - अंसार कंबरी-

बेशक मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इन्कार ।

पहले अपने बाट तो जाँच-परख ले यार ॥ -हस्तीमल हस्ती-

अग्निपरीक्षा भी कहाँ जोड़ सकी विश्वास ।

युग बीते, बीता नहीं, सीता का वनवास ॥ -सरिता शर्मा-

अर्थहीन कुछ ने कहा, कुछ ने अर्थातीत ।

अव्याख्येय रहस्य सा जीवन हुआ व्यतीत ॥ -शिवओम अंबर-

पत्रिका छः वर्षों में चवालीस अंक निकाल चुकी है। लगभग पौने दो सौ पृष्ठों का दोहों पर केन्द्रित यह अंक पाठकों को कई सिद्ध दोहाकारों की रचनाओं से रूबरू होने का मौक़ा देता है। नए दोहाकारों को सीखने के लिए अंक में पर्याप्त सामग्री है।

अंक - 'सारस्वतम', 1-छिब्बर मार्ग, देहरादून - 248001 से मंगाया जा सकता है।

- विवेक मिश्र -

Jun 29, 2010

'युद्धरत आम आदमी'













यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि 'युद्धरत आम आदमी' मात्र पत्रिका नहीं है। यह एक आंदोलन है। एक ऐसा आंदोलन जो तमाम आंदोलनों, अभियानों और क्रांतियों में नज़र अन्दाज़ किया जाता रहा। हमेशा जिसे धकिया कर वार्ताओं से, योजनाओं से, किताबों और पत्रिकाओं से बाहर निकाला जाता रहा। यह ऐसा आंदोलन है, जो कभी किसी राष्ट्रीय पार्टी के एजेंडे में प्रमुखता नहीं पा सका। तथाकथित बुद्धिजीवीयों ने, साहित्यकारों ने भी इसे छूने से परहेज़ किया। पत्र-पत्रिकाओं में, सहित्य में हज़ारों-लाखों की तदाद में रोज़ छपने वाले पन्नों में इस विषय को हाशिए तक पर जगह नहीं मिली।
रमणिका फ़ाउन्डेशन ने अपने तमाम प्रकाशनों के साथ 'युद्धरत आम आदमी' के माध्यम से समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे, अपनी जगह ढूँढ रहे लोगों को एक आवाज़ दी।
'युद्धरत आम आदमी' का पूर्वांक-101, 2009 - "सृजन के आईने में - मल-मूत्र ढोता भारत" जिसका संपादन रमणिका गुप्ता तथा सुशीला टांकभौरे ने किया है, जो कि अंक-103 (अप्रेल-जून, 2010) के साथ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
जैसा कि अंक के मुख्य पृष्ठ से ही बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि यह अंक बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी दुराव-छुपाव के सीधे-सीधे उन लोगों की बात कर रहा है, जो सदियों से रोज़ सुबह उठकर अपने ही जैसे दिखने वाले इन्सानों का मल-मूत्र समेटने और उसे अपने सिर पर ढोकर घर, गाँव, शहर से दूर ले जाकर फेंकने जैसे अमानवीय काम को अंजाम देते हैं। यह काम करते हाथ एक दिन के लिए रुक जाएँ तो कितने ही घरों की सुबह भी ठहर जाए। आज इक्कीसवीं सदी में विकास का दम भरते, विश्व शक्ति बनने का सपना देखते भारत की हवा उस समय निकल जाती है, जब कोई इन्सान अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने जैसे काम को आज भी करने के लिए विवश दिखाई देता है और ऐसे लोगों की संख्या दस-बीस या सौ-दो सौ नहीं बल्कि हज़ारों-लाखों में है। आज भी ग्रामीण भारत में सैंकड़ों गाँवों-कसबों में हज़ारों परिवार रोज़गार के विकल्प के अभावों में, इस काम को करने के लिए मजबूर हैं।
अंक का संपादन पूर्णतया निष्पक्ष होकर निर्भीकता से किया गया है। अंक में विषय से संबन्धित दलित लेखन को उसकी अन्तर चेतना के साथ समाहित किया गया है।
आवरण चित्र एंव कला निर्देशन डॉ सुधीर सागर का है। पत्रिका का मुख्य पृष्ठ ही विषय के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। अंक में हिन्दी के साथ मराठी, गुजराती, तेलुगू के लेखकों को भी स्थान दिया गया है। अंक में कहानी, कविता, पुस्तकों के अंशों, समीक्षात्मक आलेख एंव विवेचनात्मक मूल्यांकनों को, नाटक एंव लघुकथाओं को शामिल किया गया है।
रमणिका फ़ाउन्डेशन के इस प्रयास से अपनी जगह ढूँढते विषय एंव उस पर हो रहे लेखन और चिन्तन को पर्याप्त जगह मिली है। अंक की चर्चा भी रही। समस्या में गहराई से उतरने और उसे समझने का उन लोगों को भी मौक़ा मिला जो इस विषय में सोचने से पहले ही छी-छी कहके नाक पर रूमाल रखकर वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए इसे पूर्वजन्मों का लेखा कह कर रास्ता बदल लेते हैं।
पत्रिका जो अब पुस्तक के रूप में है, उसने दलितों को सभी भुलावों से दूर हटकर वर्ण व्यवस्था की थोथी पट्टी न पढ़कर, उसे जलाकर नए भविष्य की नींव रखने का आह्वान करती है। नई व्यवस्था रचने को उकसाती है और जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या स्वंय को दलित समझकर इस कार्य से जुड़े रहने की थोथी दलील को सिरे से खारिज करती है। दलित चेतना को जगाने की दिशा में यह एक मज़बूत क़दम है।
यह बात अजय नावरिया अपनी कविता में कुछ ऐसे कहते हैं :-
"शब्द थे, बहुत पहले से
पर मेरी मुट्ठीयों में नहीं थे
कस कर बाँध दिया था
उन्हें मेरी आँखों पर
ताकि देख न सकूँ उन के भीतर
अर्थ की चिल्लाती रोशनी को
बेशक, मुट्ठी में आते ही
चकाचौंध हुई आँखें, पल भर को
……फिर बन गया वह
झरझर झरता झरना
……ये मेरी हथेलियों पर
पंख लगाए उड़ते शब्द
ये समूचे अस्तित्व में सेंध लगाते
इनके असीमित अर्थ ……
असीमित शब्दों को उघाड़ता नए आयाम रचता, चेतना का प्रकाश फैलाता यह अंक, सचमुच जड़ मान्यताओं की आँखें चुँधिया देगा। इसकी रोशनी का स्वागत किया जाना चाहिए।
- विवेक मिश्र -




Jun 17, 2010

क्षितिज का सीमान्त

काव्य संग्रह - क्षितिज का सीमान्त
कवयित्रि - डॉ कौशल्या गुप्ता
प्रकाशक- शिल्पायन
मूल्य - 150/-
कौशल्याजी की कविताएँ किन्हीं विशेष समस्याओं, उनके कारणों या उनके समाधानों के आस-पास नहीं बुनी गई हैं। ही उनमें वादों, प्रतिवादों और सिद्धान्तों का निरूपण या खण्डन है। उनकी कविताएँ जीवन के अगाध अनुभवों की वे झाकियाँ हैं जिनमें कवि की दृष्टि एक द्रष्टा की है। उनकी कविताओं का कोई पक्ष या विपक्ष नहीं है। वे एक नदी की भाँति बहती हैं और अपने दोनों किनारों को भिगोती चलती है। इसीलिए उनकी कविताओं में दो अलग-अलग किनारे तो दिखते हैं पर धारा निष्पक्ष रहकर एक ही समय में दोनों किनारों को छूती है।
उनकी कविताओं में एक कभी न ख़त्म होने वाली ताज़गी है। उनकी कई कविताओं ने कई दशकों का सफ़र बड़े धैर्य से तय किया है। जब मैंने उनकी रचनाओं के पिटारे को खोला, तो पाया कि उसमें कितने ही रत्न छुपे हैं। बहुत कोशिश के बाद भी उनमें से सबको इस संग्रह में तो नहीं रखा जा सका, पर निश्चय ही उनकी कुछ श्रेष्ठ रचनाएँ 'क्षितिज का सीमान्त' में आपको क्षितिज का सीमान्त स्पर्श करती दिखेंगी।
- विवेक मिश्र -

Jun 16, 2010

सच्ची संवेदनाओं की ईमानदार कविताएं

कविता संग्रह - शब्द उस पार के
कवि - शिवचरण सिंह 'पिपिल
प्रकाशक - शिल्पायन
मूल्य - 150/-


शिवचरण सिंह जी का काव्य-संकलन उनके हृदय में गहरे तक पैठ किए बैठे लोक संस्कारों और समाज के वंचित वर्ग के लिए सच्ची संवेदनाओं से उपजे भावों के लोक गीतों की धुनों में ढलने से बना उनके गीतों की भाषा माटी की महक, नीम की छाँव, गाँव की पगडंडियों में उड़ती धूल और अन्न के अभाव में बुझे चूल्हे से उठती भाप से बनती है। इनका व्याकरण क़लम-किताब छोड़कर मज़दूरी करते हाथों से, किसानों के घरों में भूखे-बिलखते अबोधों की चीख़ से और कमर तोड़ मेहनत करके आधे पेट खाकर घर की इज़्ज़्त ढाँकती, मुस्कुराती स्त्री की आँखों से छलछला उठे आसुँओं से निर्मित होता है।
शिवचरण जी ने बाल मज़दूरों को पुनः क़लम-किताब थमाने और उनको पुनः उनके घर-परिवार से मिलाने में अपने कार्यकाल में महत्वपूर्ण काम किया है और आज भी वह कई सामाजिक संस्थाओं साहित्य के माध्यम से उन बच्चों के लिए निरन्तर काम कर रहे हैं। उनकी कविताओं और गीतों में जनगीत बनने की पूरी ताक़त है। वे आम आदमी की भाषा में आम आदमी की बात कहते हैं, जो शोषित और दलित वर्ग के ज़ख़्मों पर मरहम और सत्ता और शासक के मुँह पर तमाचे का काम एक साथ करती है। वह ग़रीबी और उससे जुड़े छद्म सामाजिक सरोकारों सरकारी योजनाओं और झूठे विकास के दावों की कलई खोल कर रख देते हैं और कई स्थानों पर तो वह इसके लिए काव्य की भाषा और उसकी लय ही नहीं अपने कवित्व को भी उठाकर ताक पर रख देते हैं, पर उनके कथ्य मे सच्चाई है, ईमानदारी है और इन दोनों को आगे भी बनाए रखने की मंशा है।
उनकी कविता के नायक सिर पर मोर-पंखी सजाए, हाथ में बंसी लिए, सोने की पायल की छम-छमके साथ आँगन में खेलते बाल-कृष्ण नहीं हैं। उनकी कविता के नायक रैंता, पैंता और पलैंता जैसे मिट्टी-कीचड़ में सने सड़कों पर नंग-धड़ंग दौड़ते, कचरे से खाना ढूँढ़ते वे बच्चे हैं जिनके पैदा होने के बाद उनके माँ-बाप के पास उनका नाम रखने की फ़ुर्सत भी नहीं रही। उन्हें किसी ने मुस्कुराते हुए एक पल रूक कर नहीं देखा, जिन्होंने पेट भरने के लिए कब मज़दूरी शुरू की उन्हें ख़ुद भी याद नहीं। शिवचरण जी की आवाज़ को चहुँओर से समर्थन मिले, समाज से बाल मज़दूरी समाप्त हो। शोषित महिलाओं में स्त्री सशक्तिकरण की आवाज़ बुलन्द हो। इन गीतों को गुनगुनाता कोई बंजारा कभी आपको किसी रास्ते में मिले, ऐसी इच्छा के साथ, इस संग्रह के प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ।
-विवेक मिश्र


May 9, 2010

आनंदम और जगदीश रावतानी







जगदीश रावतानी, गायक, कवि और आनंदम संस्था के संचालक हैं। इंडियन सोसायटी ऑफ़ ऑथर्स के कार्यक्रमों में जगदीशजी से मुलाक़ात हुई, उनकी नज़्मों ने ध्यान खींचा और उनके बुलावे पर आनंदम संस्था के एक कार्यक्रम में शामिल हुआ। जगदीश जी सिन्धी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं पर लिखने से भी ज़्यादा साहित्यिक, सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन वह जिस लगन और उत्साह से करते हैं देखते ही बनता है। उनमें जितना जोश लिखने के लिए है उससे कहीं ज़्यादा दूसरों की कविताओं को सुनने का है, जो कम देखने को मिलता है।
जगदीश कई टीवी कार्यक्रमों का निर्माण एंव निर्देशन तथा कई कार्यक्रमों में अभिनय भी कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी जगदीश रावतानी निरन्तर साहित्य सेवा में लगे हैं। उनकी अधिकांश ग़ज़लें, नज़्में और कविताएँ व्यंग्य में बहुत गहरे विचारों को, गंभीर बातों को बड़ी सहजता से कह जाती हैं।

उनकी एक कविता है:-
"मेरे पास था एक शक्तिशाली गुलेल
जिससे पत्थर फेंकने का खेलता था खेल
खेलते-खेलते महारथ हासिल कर मैं बहुत ऐंठा
प्रकृति ने किया दण्डित
जब आसमाँ में छेद कर बैठा।"

जगदीश रावतानी और आनंदम को विवेचना की ओर से शुभकामनाएँ ।
- विवेक मिश्र -

Feb 6, 2010






































हंस पत्रिका, फ़रवरी - २०१० की संख्या में विवेक मिश्र की कहानियों की किताब "हनियां तथा अन्य कहानियाँ" पर लिखी, श्री रमेश प्रजापति की समीक्षा प्रकाशित हुई है। ऊपर दी गई इमेजेस को क्लिक करने पर, समीक्षा पढ़ी जा सकती है।






















Jan 27, 2010

वर्ल्ड बुक फ़ेयर - २०१०, ३० जनवरी से 7 फ़रवरी, प्रगति मैदान, आई टी ओ, दिल्ली
शिल्पायन, हॉल नम्बर - १२ ए, स्टॉल नम्बर - १७१,१७२, व १७३ में विवेक मिश्र की तीनों किताबें:
१ हनियां तथा अन्य कहनियाँ - कहानी संग्रह
२ बोल उठे हैं चित्र - चित्र-कविता संग्रह
३ लाईट थ्रु अ लेबेरिन्थ -अंग्रेज़ी में अनुदित कविताएँ उपलब्ध हैं।






Jan 23, 2010













प्रकाशक - प्रोफ़ेसर पी लाल, राईटर्स वर्कशॉप, कोलकाता
मूल्य - रू १५०/-

पिछ्ले दिनों विवेक मिश्र की कविताओं एवं ग़ज़लों का अंग्रेज़ी में अनुवाद, प्रोफ़ेसर पी लाल, राईटर्स वर्कशॉप द्वारा, कलकत्ते से प्रकशित हुआ है। इस किताब का नाम “लाईट थ्रु अ लेबेरिंथ” है एवं इसे अमृता बेरा ने अनुवाद किया है। इस किताब को प्रकाशक के वेबसाइट http://www.writersworkshopindia.com/ पर जाकर देखा व ख़रीदा जा सकता है।

किताब से:

Desire
In a big
courtyard
racing a
small bicycle,
round and round,
a child of seven
doesn’t know
which part
of the world
he is in.

He doesn’t know
since when,
the huge,
golden sphere
shining throughout
the dawn till dusk
is wandering
across the
sky blue ground,
hanging
upside down,
above his head.

He doesn’t
even know
from where does
suddenly
the machine birds
appear,
whizzing angrily
across the
sky blue ground
and drop
balls of fire
around his house

He only understands
this much,
that even after
so much
being effaced
around him,
he is the
only one
left with
two legs,
one bicycle
and the desire
to race it
fast,
round and round,
race it
fast
round and round



Identity
I am constantly
losing my identity,
getting smaller
and even
more small.

Suppressing my anger
and frustration,
I find myself
changed into
different forms.

The mirror too
is surprised
to see my image,
for I’m taking
a new shape
each day.

Sensitivity
within me,
seems to have
drained,
for nothing
is left now,

Whatever remains
outside,
is consuming me,
and I am
consuming it too

मूल कविताएं 'इच्छा' एवं 'अस्तित्व', मेरे अन्य चिट्ठे 'कविता का कोना' में पढ़ी जा सकती हैं।

Jul 1, 2009

‘वसंत तुम कहाँ हो’ – स्नेह सुधा नवल



कविता संग्रह - ‘वसंत तुम कहाँ हो’
कवियित्रि - स्नेह सुधा नवल
प्रकाशक - अमृत प्रकाशन
मूल्य - रु १००/-



स्नेह सुधा नवल का काव्य संग्रह ‘वसंत तुम कहाँ हो’ की कविताएँ एक विस्तृत जीवन में समेटे गए गहन एंव नितान्त निजी अनुभवों, स्मृतियों एंव सघर्षों की कविताएँ हैं। इन कविताओं का संसार स्त्री मन के उन सघर्षों की ओर इशारा करता है, जहाँ शिक्षित, सुसंस्कृत मध्यम वर्ग की महिलाओं के जीवन में बाहर से सबकुछ सामान्य, ख़ुशहाल एंव पूर्ण दिखता है, परन्तु इस रूपहले आवरण के पीछे बहुत कुछ अप्रिय, अशोभनीय एंव असामान्य छुपा रहता है जिसे स्वंय जानने एंव अनुभव करने के बाद भी उसे ढक कर, ऊपर से मुस्कुराते रहना ही नारी जीवन की विवशता होती है।
तुम पुष्प हो माना/अपने मकरन्द में मस्त………………
पर क्यों भूल गए तुम/कि तुम फूल हो
तो मैं काँटा नहीं/तुम्हारी ख़ुशबू हूँ
जिसे तुमने अपने संग/कभी बाँटा नहीं
_____________
उगाओ जाओ तुम काँटे
मैँ फूल ही उगाऊँगी ……………
मैं समेट कर सब अपनी अंजुरी से
भर लूँगी अपना आँचल ……………
…… यही तो दिया है तुमने मन से ……

सब कुछ पा कर भी जहाँ एक कभी न भरने वाली रिक्तता, चँहु ओर फैले कोलाहल के बीच एक कभी न टूटने वाले सन्नाटे से घिरी मनोदशा में सबके बीच खड़ी होकर सबको बहुत दूर से देखती हुई स्नेह सुधा की कवियित्री जब अतीत की ओर हाथ बढ़ाती है तो मन में अभी तक संजोकर रखी स्मृतियों से कुछ ऐसे पल झरने लगते हैं, जो बहुत सुखद हैं पर आज की आपा-धापी में उन्हें पुनः पाना संभव नहीं बल्कि अब मात्र उनकी कल्पना ही की जा सकती है –
उन खण्डहरों की याद
अभी भी ताज़ा बनी है
आज भी जब याद
उस दिन की आती है
मैं अपने ही एक हाथ से
दूसरे को दबा
तुम्हारी कल्पना किया करती हूँ।

स्नेह सुधा कि कविताओं में नारी संघर्ष सतत झलकता है पर वह पुरूष के विरूद्ध नहीं खड़ा है, वह नारी के आगे बढ़ने को, उसके पुरूष हो जाने या सत्ता पलट करने के संघर्ष के रूप में सामने नहीं आता बल्कि वह नारी के अपने में निहित पूरी शक्तियों के साथ, अपने संस्कारों के साथ सामाजिक, पारिवारिक और व्यैक्तिक स्तर पर मज़बूती से खड़े रहने का पक्षधर है।
नरेन्द्र मोहन उनकी कविताओं के बारे में लिखते हैं कि इन कविताओं में बिना किसी पूर्वाग्रह के अन्तर्प्रवेश करना चाहिए। संस्कार सम्पन्न, संघर्षशील नारी के पक्ष से लिखी गई ये कविताएँ विभिन्न परम्परागत प्रतीकों के माध्यम से स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों का कथन करती हैं। वे नए ज़माने में नारी अस्मिता के नए रूपों की टोह लेती हैं। ये कविताएँ बुद्धी और भावना के द्वन्द में फँसी नारी को, उस ख़ुश्बू की ओर ले जाती हैं, जिसे पुरूष ने अपने संग कभी नहीं बाँटा।
इस संग्रह की कविताएँ अतीत की झाँकियाँ दिखाती, पीछे छूटे पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों को, स्मृतियों को समेटती, संजोती और उन्हें संवेदना के धागे में पिरोती चलती हैं। परन्तु कहीं-कहीं भावातिरेक में वे अपनी निजता के दायरे में सिमटकर किसी पुरानी डायरी के वो अधूरे पन्ने बनकर उभरती हैं, जहाँ उन्हें एक निजी अनुभव से निकल कविता बनने का सफ़र अभी करना बाक़ी है। संकलन में अलग-अलग समय पर लिखी गई कविताएँ हैं, जिनके चुनाव करने में थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था, क्योंकि यह संग्रह उनकी समस्त कविताओं का संकलन नहीं है। पर जैसा कि संग्रह की भूमिका में नरेन्द्र मोहन लिखते हैं कि इस संग्रह की कविताओं को मानों/प्रतिमानों के आग्रहों से मुक्त होकर देखा-पढ़ा जाना चाहिये और सीधे-सीधे इन कविताओं में संस्कार, स्मृति और संवेदना की जो त्रिधारा प्रवाहित है, उसका आकलन किया जाना चाहिए।
यह सही है कि उसी प्रकाश में ‘वसंत तुम कहाँ हो’ को पढ़ा जाए पर स्नेह सुधा जिस पृष्ठभूमि से हैं, उनका जो कार्यक्षेत्र है और उस सबके साथ हरीश नवल जी जैसे सूक्ष्म एंव मौलिक दृष्टि रखने वाले साहित्यकार के संग एंव सानिध्य से बड़ी उम्मीदें बँधती है, और एक आशा जमती है कि ‘वसंत तुम कहाँ हो’ एक प्रश्न नहीं एक खोज बनेगा और जल्दी ही स्नेह सुधा नवल वसंत को खोजकर अपनी अँजुरी में भरकर अपने अगले संग्रह में लाएँगी।
- विवेक मिश्र -

स्नेह सुधा नवल दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कालेज के हिंदी विभाग में वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उन्हें कबीर सेवा सम्मान सहित कई सम्मानों एंव पुरस्कारों से विभुषित किया जा चुका है।

Jun 28, 2009

मिथिहास को इतिहास में बदलता एक सच्चा दस्तावेज़ है संजीव जी का उपन्यास ‘आकाश चम्पा’

उपन्यास – आकाश चम्पा
लेखक – संजीव
प्रकाशक – रेमाधव पब्लिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड
मूल्य – रू 240/-



दुनिया के पवित्रतम शब्द हैं “मैं ग़लत था”
यूँ तो किसी के मान लेने से ही कि वह ग़लत था, उसकी भूल सुधार की इच्छा का बीज पड़ जाता है। परन्तु इतिहास में जाकर भूलों को ढूँढना, उन्हें सुधारना एक ज़रूरी एंव जोख़िम भरा काम है पर उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है इतिहास से बाहर वर्तमान में हो रही भूलों को न केवल समझना बल्कि आगे बढ़कर उन्हें रोकना और उसके लिये बड़े से बड़ा जोख़िम उठाना। इन्हीं दो किनारों के बीच बहती है आकाश चम्पा के नायक मोतीलाल के जीवन की नदी।
आकाश चम्पा का नायक मिथिहास नहीं इतिहास को खोजना चाहता है, वह रियलटी नहीं एक्ज़ैक्टिट्यूड को थाम कर सत्य का पुनरावेष्ण करना चाहता है और उसकी पुनर्स्थापना भी। परन्तु इतिहास या कहें सच्चा इतिहास कितना कारगर होता है वर्तमान जीवन को समझने, उसकी चुनौतियों का सामना करने में, जबकि नित नया इतिहास बन रहा है और उस में भी पल-पल शताब्दियों पुराने इतिहास से भी बड़ी और भूलें हो रहीं हैं। आज हिंसा और विध्वंस के लिये मानवता विरोधी ताक़तों के हाथ में जो हथियार हैं, वह इतिहास में प्रयुक्त हथियारों से हज़ारों गुना ज़्यादा तबाही फैलाने वाले हैं। इसी अन्तर्द्वन्द से जूझते मोतीलाल समय की नदी में बहते हैं – “नदिया एक घाट बहुतेरा……” से रास्ते में कई घाट, कई पड़ाव आते हैं और हर घाट से नदी अलग दिखती है, और वह उस घाट पर खड़े लोगों के लिये रियलटी भी है पर उस पड़ाव की, उस घाट की यथा तथ्य स्थिति (एक्ज़ैक्टिट्यूड) क्या है? यही देखने-समझने के लिये यह नदी कहीं-कहीं रूक जाती है और इसी के साथ घूमती पृथ्वी, चाँद-सितारे सब ठिठक जाते हैं और फिर इतिहास या कहें मिथिहास से निकल-निकल कर पात्र अपने असली चेहरे दिखाते हैं जो चौंका देने वाले हैं, वहाँ ऐसे भी कई चेहरे मिलते हैं जिन्हें मिथिहास लिखने वालों ने नज़र अन्दाज़ कर दिया या, यह सोच कर दफ़्न कर दिया कि शायद अब कोई समय के पन्ने फिर नहीं पलटेगा और यह चेहरे झूठे इतिहास के मलबे में दब कर दम तोड़ देगें। परन्तु आकाश चम्पा में इतिहास फिर से जी उठा और उसी के साथ जी उठी हैं वे सभी कराहें, वेदनाएँ जो शताब्दियों से मिथिहास के मलबे के नीचे दबी छ्टपटाती रहीं और तमाम इतिहासकार उसी मलबे पर विशाल अट्टालिकाएँ खड़ी करते रहे, जो संजीव जी के इस उपन्यास में भरभरा कर गिरती हैं।
इन इतिहास की भूलों को सुधारने में मोतीलल इतने खो जाते हैं कि इतिहास से बाहर घटने वाले वर्तमान पर उसका ध्यान ही नहीं जाता, जो हर पल इतिहास बन रहा है, और जब ध्यान जाता है तब बहुत देर हो चुकि होती है, पर फिर भी मोतीलाल इतिहास से बाहर निकलते है। अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं, संघर्ष में शामिल होते हैं और फिर ख़ुद इतिहास बन जाते हैं। आकाश चम्पा एक साधारण सत्ता एंव समाज में लगभग नगण्य सी हैसियत रखने वाले एक आम आदमी के असाधारण संघर्ष की कहानी है। और यह संघर्ष भूत-वर्तमान और भविष्य के लिये एक साथ चलता है। और इस में व्यैक्तिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक संघर्षों के साथ इतिहास के प्रेतों से भी निरन्तर भीषण संग्राम होता है, जिस में अन्ततः मोतीलाल की विजय होती है परन्तु वह विजय व्यैक्तिक नहीं है और न ही वह उसके संघर्ष का समापन ही है, बल्कि वह बुझते दिए की भभकती लौ की आवाज़ है, जो बुझते-बुझते भी अन्धेरे से लड़ना सिखा जाती है।
“यह उदय की लाली भी है और अंत की भी।” यह भूत, भविष्य और वर्तमान को एक साथ संदेश देती है।
“बुलबुल तरू की फुगनी पर से संदेश सुनाती यौवन का।” और इस संदेश के साथ आकाश चम्पा असली आकाश चम्पा की तरह यह उम्मीद बँधा जाती है कि जिन डालियों पर फूल नहीं आए, उन पर फिर बहार आएगी, फिर फूल लगेंगे।
पहाड़ियों को पहाड़ से उतारा जाएगा, भुला दी गई जातियों को ढूँढ कर उनके शौर्य की, उनके संघर्ष की गाथा फिर से लिखी जाएगी। इतिहास की स्लेट से सब कुछ मिटा कर फिर इतिहास लिखा जाएगा।

-‘विवेक मिश्र’-

संजीव समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में प्रथम पांक्तेय हस्ताक्षर हैं।
कथा क्रम, इंदु शर्मा (लंदन), भिखारी ठाकुर एंव पहल जैसे महत्वपूर्ण सम्मानों से विभूषित हैं। वर्तमान में ‘हंस’ के कार्यकारी संपादक हैं।

Apr 22, 2009

‘डॉ॰ मधुकर गंगाधर – संदर्भ और साधना’













डॉ॰ मधुकर गंगाधर के जीवन एवं कृतत्व पर डॉ॰ रमेश नीलकमल द्वारा संपादित पुस्तक ‘डॉ॰ मधुकर गंगाधर – संदर्भ और साधना’ उनके समकालीन कवियों, कथाकारों एवं प्रशंसकों और आलोचकों के द्वारा लिखे लेखों का संकलन है।
यह पुस्तक एक व्यक्तित्व के निर्माण की झाँकियाँ प्रस्तुत करती है, जो पाठकों को आश्चर्यजनक एवं अतिश्योक्तिपूर्ण लग सकती हैं परन्तु डॉ॰ मधुकर गंगाधर का जीवन ही ऐसा है।
इस संकलन में एक कथाकार, एक कवि, एक नाटककार तथा एक अधिकारी और एक अक्खड़ और फक्कड़ व्यक्ति से जुड़ी सच्ची कहानियाँ हैं, जो रुकना या झुकना नहीं जानता।
डॉ॰ गंगाप्रसाद विमल, डॉ॰ मधुकर गंगाधर के कहानीकार के बारे में कुछ इस तरह कहते हैं - "20वीं शताब्दी की अधिकांश लड़ाईयाँ कहानी की सरहद पर लड़ी गईं हैं। इस लड़ाई का सचेत स्वर स्वतंत्रता के बाद की कहानी में उभरता है। सचेत इसलिये कि कहानी मानवीय संस्कृति की विशाल सम्पदा का एक छोटा सा कारण है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय परिवेश को हम समुद्र में पड़े समूह के समानार्थक रख सकते हैं। जहाँ भारतीय जनसमाज प्रजातंत्र, परसंस्कृतिकरण, बेरोज़गारी, असमानता, पूंजीवादी दवाब, साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ और भी न जाने कितने बिंदु हैं जिनके बीच से अहर्निश गुज़रता है। ठीक ऐसे समय में कुछ नए लेखकों ने मानव संबंधों के नए आयामों का अंकन किया। इस में यशपाल, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, मोहन राकेश, कमलेश्वर, रेणु, मार्कण्डेय, राजेन्द्र अवस्थी, मन्नु भन्डारी, विजय चौहान, निर्मल वर्मा आदि बहुत से नाम हैं। उन्ही के समान्तर अपेक्षाकृत कुछ नए युवा स्वरों में जो कुछ नाम उस समय चर्चा में रहे उन में मधुकर गंगाधर का नाम उस दृष्टान्त की तरह है, जो पीढ़ियों के चिन्तन, उनकी दृष्टि और उनके सरोकार में भिन्नता स्पष्ट करता है।"
"प्रेमचन्द की कहानी 'कफ़न' और मधुकर गंगाधर की कहानी 'ढिबरी' दो कथाकारों की दृष्टि, उनकी पक्षधरता, उनके सम्पूर्ण चिन्तन को दो ध्रुवों के रूप में स्थापित कर देती है।"
मधुकर गंगाधर का साहित्यिक व्यक्तित्व बहु आयामी है। उन्होनें कहानियों के साथ-साथ उपन्यास, नाटक, रेडियो रूपक, संस्मरण आदि भी लिखे हैं।
उनका नाटक 'भारत भाग्य विधाता' भारतीय लोकतंत्र और उसके राजनेताओं के असली चरित्र को उजागर करता है।
लेकिन इस सब के बीच उनके कवि को नहीं भूला जा सकता। उनका कवि रूमानी न होकर यथार्थवादी है।
गंगाधर और उनके दौर के कवियों ने कल्पनायें नहीं बल्कि देखा एवं भोगा हुआ यथार्थ लिखा है।
जैसे 'गाँव' शीर्षक से कविता में धूमिल का अनुभव निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त हुआ है:-
"चेहरा-चेहरा डर लटका है
घर-बाहर अवसाद है,
लगता है यह गाँव नरक का
भोजपुरी अनुवाद है"
गाँव का ऐसा ही अनुभव मधुकर गंगाधर का भी है:-
"कई दिनों की भूखी, बूढ़ी गाय
कीचड़ में धँस गई है,
मेरे गाँव की गर्दन,
अंधे घड़ियाल के मुँह में,
फँस गई है।"
मधुकर गंगाधर का कवि ख़ामोश होकर सिर्फ़ यथार्थ को देखता, सहता और कविता में रहता है।
"मेरी आँखें गोलियों की तरह चमक उठी हैं
और मैं बन्दूक की तरह तन गया हूँ।
लगता है, क़ुतुब मीनार पर मनहूस कुत्ता रोता है
नक्सल वाड़ी के सिवा पूरा मुल्क सोता है।"
मधुकर गंगाधर के जीवन पर प्रकाश डालते कई लेख भी बहुत रोचक हैं, जिनमें डॉ॰ बलदेव वंशी का लेख "सांस्कृतिक, पारिस्थितिकी और मधुकर गंगाधर" एक ऐसा लेख है जो कोई अंतरंग मित्र ही लिख सकता है। 'एक शहर बनता हुआ गाँव' शीर्षक के लिखे लेख में प्रो॰ कमला प्रसाद 'बेखबर' जिस खिलन्दड़ेपन वाले आशिक़ मिज़ाज मधुकर गंगाधर को सामने रखते हैं वह उन लोगों के लिए बिल्कुल नया है जो एक अक्खड़ और सख़्त गंगाधर को जानते हैं। इस लेख में उनके जीवन के कई प्रेम-प्रसंगों का विस्तार से सिलसिलेवार कहा जाना और अंत में उनका अपनी पुरानी कार के प्रति प्रेम उनकी जीवन शैली को दर्शाता है, जिसमें वह गाँव और शहर के बीच समन्वय बिठाते रहे। बाहरी तौर पर वह एक उच्च पदस्थ अधिकारी रहे पर मन में एक गाँव सदा बसा रहा।
संकलन के बीच-बीच में उनकी कविताओं की पँक्तियाँ पढ़कर अच्छा लगता है। एक रचनाकार के रूप में, एक मित्र, पिता, पुत्र, पति एवं एक साफ़ दिल इन्सान के रूप में मधुकर गंगाधर जैसे अग्रज साहित्यकार की छवि को संपादक ने जिस प्रकार सबके सामने रखा है वह प्रशंसनीय है। आज की पीढ़ी के सामने हमारे पुराने साहित्यकारों के रचनाकर्म एवं उनके जीवन पर इस प्रकार के संकलन, बीते समय की साहित्यिक एवं सामाजिक परिस्थितियों की एक झाँकी देखने के लिये अतीत की ओर एक झरोखा खोल देते हैं, जिससे झाँकते हुए हम फिर उस समय को कुछ देर के लिए जीने लगते हैं, जब रेणु, नागार्जुन जैसे रचनाकार मधुकर जी के साथ सड़कों पर चलते, बतियाते दिखते हैं।

- विवेक मिश्र

Apr 12, 2009

श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी को श्रद्धांजलि

हिन्दी साहित्य के शीर्ष पुरूष श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी के निधन पर हम सभी की ओर से श्रद्धांजलि।

हिन्दी साहित्य की विधियों में विचरते आज भी ‘आवारा मसीहा’ एक मील के पत्थर सा खड़ा मिलता है।

उनके रचनाकर्म को, उनके व्यक्तिव को, उनके आदर्श जीवन को एवं उनके हिन्दी साहित्य में अमर योगदान को ‘विवेचना’ की ओर से नमन।


- विवेक मिश्र

Apr 10, 2009

कामयाबी की दास्तान : नल्लि








"कामयाबी की दास्तान" पद्मश्री डॉ नल्लि कुप्पुस्वामी चेट्टियार की जीवनी है, जिसे प्रसिद्ध अनुवादक, लेखक एवं बहुभाषाविद् डॉ॰ एच॰ बालसुब्रह्मण्यम ने लिखा नाम है।
"नल्ली" एक ऐसा नाम है, जो भारतीय परिधानों में, विशेषकर सिल्क की गुणवत्ता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। यहाँ इसी नाम के पीछे की शक्ति को उजागर करने की कोशिश की गई है। वह शक्ति के पात्र एक व्यक्ति कुप्पुस्वामी चेट्टियार नहीं हैं बल्कि एक परम्परा है, एक पूरी की पूरी दक्षिण भारतीय संस्कृति है। शुद्धता की संस्कृति। सच्चाई, कर्मठता और सरलता के संस्कारों को साथ लेकर सतत आगे बढ़ने वाली संस्कृति।
इस पुस्तक में संस्था, व्यक्ति एवं परम्परा के बीच एक ऐसा ताना- बाना डॉ॰ एच॰ बालसुब्रह्मण्यम ने बुना है, जो नल्लि जी के जीवन के बारे में तो बताता ही है, साथ ही साथ हमें दक्षिण भारतीय जीवन के दर्शन, रहन-सहन एवं गुणवत्ता के सिद्धान्तों के पीछे छुपी कठोर परिश्रमी एवं सत्यनिष्ठा पर खड़ी दक्षिण भारतीय जीवन शैली की झाँकी दिखाती चलती है।
इस में नल्लिजी के व्यक्तित्व एवं जीवन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला गया है, जिससे पता चलता है कि कोई भी संस्था के नल्लि बनने के पीछे, कितना ज्ञान, अनुभव और समर्पण होता है, जो सहज ही लोगों का भरोसा जीत लेता है और कई पीढ़ियों तक यह भरोसा क़ायम रहता है।
"ब्रेन बैंक पब्लिकेशन" द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक एक व्यापारी की जीवनी ही नहीं एक ऐसे भारतीय की कहानी है जिसने अपनी विरासत को बचाया ही नहीं है बल्कि उसे, उस गौरवशाली भविष्य के पथ पर बढ़ाया है, जहाँ से सारी दुनिया इस नाम का वैभव देख सके ।

- विवेक मिश्र

Apr 8, 2009




हिंदी साहित्य में कहानी की तथा कहानी में बाल कहानियों की यदि बात करें तो गिने-चुने नाम ही याद आते हैं और बच्चों को अच्छी कहानियाँ देने के लिए आज भी हमें पंचतन्त्र एवं अन्य पुरातन ग्रन्थों या फिर विदेशी भाषा की कहानियों के अनुवादों की ओर देखना पड़ता है।
परंपरागत दादी-नानी की कहानियाँ भी, बच्चों के बढते होमवर्क और बचे हुए समय में टी-वी एवं विडियो गेम्स ने किसी कोने में सरका दी हैं।।
ऐसे में ‘दरवाज़े खुल गए’ वेद प्रकाश कंवर का बाल कहानी संग्रह सचमुच ही उस घर के दरवाज़े खोलता है, जहाँ बच्चों के लिए एक अनोखी एवं नई दुनिया उन का इंतज़ार कर रही है।
पच्चीस कहानियों का, 128 पृष्ठों का अनुभव प्रकाशन से प्रकाशित यह संग्रह उन तमाम संभावनाओं की ओर इशारा करता है जिसमें बदलते वक़्त में बाल साहित्य को एक नई रोशनी में देखा जा सके।
वेद प्रकाश कंवर के अंग्रेज़ी में दो कहानी संग्रह तथा एक उपन्यास ‘एक नई क्रान्ति’ हिंन्दी में प्रकाशित हो चुका है।
वेद प्रकाश कंवर ने संग्रह में भाषा सहज, सरल तथा विनोदपूर्ण रखी है जो बाल एंव किशोर पाठकों को लुभाती भी है और उनकी रूचि बनाए रखती है। यह कहानियाँ वर्तमान समय में फैली तमाम कुरीतियों पर, पारिवारिक, सामाजिक, पर्यावरण संबंधी विषयों पर रोचक जानकारी तथा उपयोगी सीख देती हुई चलती हैं।
वेद प्रकाश कंवर मूलतः अंग्रेज़ी के लेखक हैं तथा उनकी मातृभाषा पंजाबी है इसलिए कहीं- कहीं हिंदी पाठकों को लय टूटती हुई लग सकती है तथा पात्रों के बीच संवाद अटपटे लग सकते हैं परन्तु कथानक नया एंव रुचिपूर्ण होने से यह कमियाँ अखरती नहीं हैं।
- विवेक मिश्र

Apr 7, 2009

दिन के उजाले की कविताएँ

कृति- दिन के उजाले में (काव्य-संग्रह)
कवि- हर्षवर्धन आर्य
विधा- कविता

आज के समय में जब कोई कविता-संग्रह मुझे प्राप्त होता है तो शिल्प, भाषा, विषय को छोड़ कर ध्यान पहले कथ्य में छिपे कवि के निज अनुभवों एवं उनकी सच्चाई तथा विश्वसनीयता पर जाता है। मन अच्छी कविता से ज्यादा सच्ची कविता ढूंढता है और उसमें दर्शक का नहीं एक दृष्टा का सब देखने का प्रयास करता है।
आज महानताएँ ढोंग बनकर सामने आ रही हैं। बड़े-बड़े व्यक्तित्वों की छाया में घोटाले पल रहे हैं। नेताओं, अफ़सरों और व्यापारियों के साथ कवि और साहित्यकार भी समयानुसार मुखौटे बदल रहे हैं। ऐसे में किसी काव्य-संग्रह को पढ़कर कोई राय बनाना कठिन हो जाता है। ऐसे ही समय में कवि हर्षवर्धन आर्य का कविता संग्रह 'दिन के उजाले' में प्राप्त हुआ। हर्ष पेशे से स्वर्णकार हैं और ऐसे परिवार से आते हैं, जहाँ उन्होंने अपने पिता के जीवन संघर्ष को बहुत क़रीब से देखा। ऐसी पृष्ठभूमि से आए कवि के लिए कविता मानसिक अवकाश में लिखी गई विलास की वस्तु नहीं है, वरन् उसके जीवन का सत्य है और इसी सत्य को प्रामाणिकता देती है। हर्ष की ये पंक्तियाँ-

पसीने से तर-ब-तर
देर रात तक
ठुक-ठुक करते हैं मेरे पिता
पीटते से हैं सोना
सोना हराम कर,

कौन कहता है-
सोने में सुगन्ध नहीं होती
फैल गई है सुगन्ध हर ओर
मेरे पिता के पसीने की!

ऐसे निज अनुभव से चलकर कविता समाज के उस वंचित, दलित वर्ग की उस पीड़ा तक पहुँचती है, जहाँ यह पूरे समाज का दर्द बन जाती हैं और कविता उसी दर्द के आगे नतमस्तक हो कर खड़ी हो जाती है-

जो भूखे के लिए
बन जाता है रोटी
जल जाता है बन कर
चूल्हे की आग

झोंक देता है
लकड़ियों की जगह
अपना तन
अपने ही हाथों से

उसी को समर्पित है
यह कविता
जो महान हुई है
उसको समर्पित होकर।

हर्ष की कविता के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी कहते हैं- ''कोई प्रयत्न नहीं है, सब कुछ सहज भाव से शब्दों में रमा हुआ है... कवि कुछ भी भूल नहीं पाता... कवि को बचपन के चेहरे की खोज है। 'दिन के उजाले' का कवि सोने की गन्ध पहचान लेता है।''
सचमुच ही हर्ष 'गवाह है आंगन का नीम' कविता में स्मृतियों का पीछा करते हैं-

तुम्हें याद है ना
जब इसकी डाली पर लगे
बर्र-ततैयों के छत्तों को
तुमने मारा था पत्थर
और ततैया ने काट खाया था
तुम्हारे कान पर
तब तुम रोए थे इतना
जितना रोई थी माँ
बड़की दीदी के ससुराल जाने पर
लिपट कर बुआ के गले
इसी नीम के नीचे

तब दीदी भी क्या कम रोई थी
गाड़ी में बैठने के बाद भी
ढूंढती वे अठारह बसंत
जो लिपटे थे
इसी नीम की टहनियों पर
फ्रॉक के धागों
तो कभी दुपट्टे की उधड़ी
क़शीदाकारी की तरह।

हर्ष का कवि जब अपने गाँव से शहर आता है तो वह खाली हाथ नहीं आता, वह इस महानगर के लिए अपना 'बहुत जेबों वाला कुर्ता' लाता है और उसमें भर कर लाता है, वो सब कुछ जिसकी प्रचुरता में, गाँव में लिखी थी उसने सच्ची कविता-

सी दो दर्जी
बहुत जेबों वाला एक कुर्ता
कुछ जेबों में रखूंगा मैं
रंग-बिरंगे फूलों की ख़ुश्बू
और कुछ में ताज़ी हवा...

कुछ में रखूंगा
मोती जैसे स्वच्छ नीर को...

कुछ में रक्खूंगा गुनगुनी
चटकीली धूप...
फिर
फिर भर कर उसे
चल दूंगा बाँटने
शहर की
झोंपड़-पट्टी में...

सच! हर्ष के पास बहुत जेबों वाला, बड़ी-बड़ी जेबों वाला कुर्ता है, जिसे 'दिन के उजाले में' लेकर वह कविता की ख़ुशबू बिखेरने के लिए निकले हैं और उन्हें भरोसा है कि-

किरण की नन्हीं से किरच में
समाई है तीव्र सौम्य ऊर्जा
हवा के प्राण भर झोंके में
समाया है समग्र प्राण-विधान।

ऐसे ही हवा के झोंके को समाज में फूँकता है, हर्ष का कवि। एक चिंगारी देकर कुछ ऐसा अलाव जलाना चाहता है, जिसके ताप से जम चुकी चेतना पिघल सके। हर्ष के ही शब्दों में कहें तो-

एक चिनगारी
सुलगाना चाहता हूँ
ताकि धधक उठे अलाव
जिसके पास आकर
जन-जन ताप सकें आग
जिससे पिघल सके
शीत में जम चुकी
चेतना!

आख़िर में हर्ष के कवित्व के लिए उनकी चिनगारी सुलगाने और उसे हवा देने की इच्छा लिए मैं सिर्फ़ इतना ही कहूँगा- 'आमीन'!

-विवेक मिश्रा

Mar 26, 2009






कहानी संग्रह का लोकार्पण
हिंदी भवन सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में कवि- कथाकार विवेक मिश्र की कृति “हनियां तथा अन्य कहानियां” का लोकार्पण वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी और दिल्ली विधान सभा उपाध्यक्ष अमरीश सिंह गौतम ने 21मार्च को किया।

विवेक मिश्र के रचनाकर्म और कहानियों पर बोलते हुए कहा कि लेखक के रूप में प्रस्तुत कहानियां साहित्य का हिस्सा तो हैं ही, इन कहानियों में जीवन दर्शन भी समाहित है। डाँ हरीश नवल ने विवेक की कहानियों के अंत को पाठकों के लिये चिंतन बिंदु देने वाला बताया। डाँ अरुण प्रकाश ढौंढियाल ने विवेक की कहानियों में परंपरा, आंचलिकता के साथ शहरी जीवन की विषमताओं को अभिव्यक्त करने वाला कहा। विवेक गौतम ने मिश्र की रचना यात्रा के पड़ावों के साथ उनके संघर्ष के विभिन्न बिंदुओं को रेखांकित किया। चित्रकार वी एस राही, पूर्व निदेशक ज्ञानपीठ दिनेश मिश्र, हिन्दी विद आर के कुशवाहा भी मौजूद थे। विवेक मिश्र ने अपनी कहानी पाठ भी किया।