पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य - विवेक मिश्रhttp://www.vivechna.blogspot.com/
किताब - शिक्षा का कर्म-साहित्य का मर्म- डॉ अरुण प्रकाश ढौंडियाल
संपादक - डॉ विवेक गौतम
-विवेक मिश्र-
पहाड़ सा निर्मल उनका सान्निध्य - विवेक मिश्र







'सरस्वती सुमन' त्रैमासिक पत्रिका का दोहा विशेषांक दोहों को उनकी पूरी समग्रता के साथ पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। पत्रिका के संपादक आनंद सुमन सिंह तथा अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' हैं। पत्रिका में हिन्दी काव्यधारा में दोहों का इतिहास, उनके प्रकार, उनका महत्व एवं उनके गुणों को उजागर करते लेख एवं साक्षात्कार हैं, जिसमें अतिथि संपादक अशोक 'अंजुम' की वरिष्ठ कवि गोपाल दास नीरज एवं सहित्यकार देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' से की बात-चीत, दोहों के विषय में चर्चा को नए आयाम देती है। दोहों के प्रकारों पर प्रकाश डालता डॉ राम स्नेही लाल शर्मा 'यायावर' का लेख नए दोहाकारों के लिए विशेषकर पठनीय एवं संग्रहणीय है। दोहों में मात्राओं के महत्व को बताता चंद्रपाल शर्मा का लेख भी शोधपरक है।
विशेषांक में संत दादू के दोहों से लेकर नई पीढ़ी के लगभग 125 दोहाकारों को शामिल किया गया है। इससे स्वतः ही दोहों की यात्रा एवं विकास का भान हो जाता है।
यूँ तो विशेषांक में वर्तमान समय के रचनाकारों को ही प्रमुखता से छापा गया है, परन्तु दोहों की विरासत की चर्चा हो और कोई संत कबीर को नज़र अंदाज़ करे, यह बात खलती ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे दोहों की चर्चा में कबीर की अनदेखी किसी भी तरह गले नहीं उतरती। शायद ही कोई रचनाकार यह भूल सकता हो कि हिन्दी कविता के इतिहास में कबीर और दोहे एक-दूसरे के पर्याय हैं।
विशेषांक के मुख्य पृष्ठ पर छपा चित्र विशेषांक की सामग्री के कतई अनुकूल नहीं है, जबकी भीतर के पृष्ठों पर छपे रेखाचित्र जो अतिथी संपादक अशोक 'अंजुम' के हैं, बहुत प्रभावशाली एवं सामग्री के अनुकूल हैं। अंक में पिछले दशक में छपी महत्वपूर्ण सतसईयों की भी अनदेखी की गई है, जिससे धर्म प्रकाश गुप्त जैसे बड़े दोहाकार अंक से बाहर हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कवि 'त्रीफ़ला' जो दोहों और सतसईयों के लिए जाने जाते हैं, उनकी सुध भी नहीं ली गई है। उसका कारण अधिकांश रचनाकारों का चुनाव मंचीय कवियों में से ही किया गया है, जिससे अधिकांश दोहों में विषयों की पुनरावृत्ति का दोष तो आया ही है, साथ ही कुछेक दोहे बहुत हल्के, चलताऊ और अर्थों में बहुत उथले प्रतीत होते हैं। विशेषांक के अंत में दिए दोहे से ही यदि यह बात करें तो यूँ होगी -
सब कुछ उल्टौ हो गयौ, भयौ बुरौ सब फेर ।
तुलसी, सूर, कबीर सब देख रहे अंधेर ।
दोहों को अपनी तुकों, मात्राओं और लय के कारण ही नहीं बल्कि अपने भीतर छुपे गूढ़ दर्शन और जनहित के लिए दिए गए संदेशों और शिक्षाओं के लिए भी प्रमुखता से जाना जाता है। आज दोहों का प्रयोग हल्के, चलताऊ जुमलों या नारों की तरह तालियाँ बटोरने के लिए हो रहा है। दोहा दरअसल दर्शन को समेटकर उसे संक्षिप्त कर जन साधारण तक पहुँचाने के लिए लिखा जाता था, इसकी भाषा लोक भाषा होती थी पर इसके अर्थों की कई पर्तें होती थीं। दोहों के गुणों की इस कसौटी पर कुछ ही दोहाकार आज खरे उतरते हैं। विशेषांक के कुछ दोहे -
इसक अलद की जात है, इसक अलह का अंग ।
इसक अलह औजूद है, इसक अलद का रंग ॥ -संत दादू-
अभी नहाया है छुरा, लगी सड़क पर भीड़ ।
घबरा कर दुखने लगी, बड़े-बड़ों की रीढ़ ॥
राजपथों पर खो गया, जीवन का भूगोल ।
ख़ाका सब पूरा हुआ, ख़ास बात है गोल ॥ -म ना नरहरि-
देख-देख पर्यावरण, बहा रहा है नीर ।
ताजमहल किससे कहे, अपने मन की पीर ॥
आसमान को छू रहे, आलीशान मकान ।
तरस रहे हैं धूप को, घर के रोशनदान ॥ - अंसार कंबरी-
बेशक मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इन्कार ।
पहले अपने बाट तो जाँच-परख ले यार ॥ -हस्तीमल हस्ती-
अग्निपरीक्षा भी कहाँ जोड़ सकी विश्वास ।
युग बीते, बीता नहीं, सीता का वनवास ॥ -सरिता शर्मा-
अर्थहीन कुछ ने कहा, कुछ ने अर्थातीत ।
अव्याख्येय रहस्य सा जीवन हुआ व्यतीत ॥ -शिवओम अंबर-
पत्रिका छः वर्षों में चवालीस अंक निकाल चुकी है। लगभग पौने दो सौ पृष्ठों का दोहों पर केन्द्रित यह अंक पाठकों को कई सिद्ध दोहाकारों की रचनाओं से रूबरू होने का मौक़ा देता है। नए दोहाकारों को सीखने के लिए अंक में पर्याप्त सामग्री है।
अंक - 'सारस्वतम', 1-छिब्बर मार्ग, देहरादून - 248001 से मंगाया जा सकता है।
- विवेक मिश्र -


कविता संग्रह - शब्द उस पार के
कवि - शिवचरण सिंह 'पिपिल
प्रकाशक - शिल्पायन
मूल्य - 150/-
शिवचरण सिंह जी का काव्य-संकलन उनके हृदय में गहरे तक पैठ किए बैठे लोक संस्कारों और समाज के वंचित वर्ग के लिए सच्ची संवेदनाओं से उपजे भावों के लोक गीतों की धुनों में ढलने से बना उनके गीतों की भाषा माटी की महक, नीम की छाँव, गाँव की पगडंडियों में उड़ती धूल और अन्न के अभाव में बुझे चूल्हे से उठती भाप से बनती है। इनका व्याकरण क़लम-किताब छोड़कर मज़दूरी करते हाथों से, किसानों के घरों में भूखे-बिलखते अबोधों की चीख़ से और कमर तोड़ मेहनत करके आधे पेट खाकर घर की इज़्ज़्त ढाँकती, मुस्कुराती स्त्री की आँखों से छलछला उठे आसुँओं से निर्मित होता है।
शिवचरण जी ने बाल मज़दूरों को पुनः क़लम-किताब थमाने और उनको पुनः उनके घर-परिवार से मिलाने में अपने कार्यकाल में महत्वपूर्ण काम किया है और आज भी वह कई सामाजिक संस्थाओं साहित्य के माध्यम से उन बच्चों के लिए निरन्तर काम कर रहे हैं। उनकी कविताओं और गीतों में जनगीत बनने की पूरी ताक़त है। वे आम आदमी की भाषा में आम आदमी की बात कहते हैं, जो शोषित और दलित वर्ग के ज़ख़्मों पर मरहम और सत्ता और शासक के मुँह पर तमाचे का काम एक साथ करती है। वह ग़रीबी और उससे जुड़े छद्म सामाजिक सरोकारों सरकारी योजनाओं और झूठे विकास के दावों की कलई खोल कर रख देते हैं और कई स्थानों पर तो वह इसके लिए काव्य की भाषा और उसकी लय ही नहीं अपने कवित्व को भी उठाकर ताक पर रख देते हैं, पर उनके कथ्य मे सच्चाई है, ईमानदारी है और इन दोनों को आगे भी बनाए रखने की मंशा है।
उनकी कविता के नायक सिर पर मोर-पंखी सजाए, हाथ में बंसी लिए, सोने की पायल की छम-छमके साथ आँगन में खेलते बाल-कृष्ण नहीं हैं। उनकी कविता के नायक रैंता, पैंता और पलैंता जैसे मिट्टी-कीचड़ में सने सड़कों पर नंग-धड़ंग दौड़ते, कचरे से खाना ढूँढ़ते वे बच्चे हैं जिनके पैदा होने के बाद उनके माँ-बाप के पास उनका नाम रखने की फ़ुर्सत भी नहीं रही। उन्हें किसी ने मुस्कुराते हुए एक पल रूक कर नहीं देखा, जिन्होंने पेट भरने के लिए कब मज़दूरी शुरू की उन्हें ख़ुद भी याद नहीं। शिवचरण जी की आवाज़ को चहुँओर से समर्थन मिले, समाज से बाल मज़दूरी समाप्त हो। शोषित महिलाओं में स्त्री सशक्तिकरण की आवाज़ बुलन्द हो। इन गीतों को गुनगुनाता कोई बंजारा कभी आपको किसी रास्ते में मिले, ऐसी इच्छा के साथ, इस संग्रह के प्रकाशन के लिए शुभकामनाएँ।
-विवेक मिश्र





उपन्यास – आकाश चम्पा
नारी मन की संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति होते हुए भी पूर्णरूपेण नारी विमर्श की कविताएँ नहीं हैं, नमिता राकेश के कविता संग्रह 'तुम ही कोई नाम दो' में।
नमिता राकेश के भीतर की कवियित्री पहले एक इंसान है फिर एक नारी, इससे उनकी कविताओं में अपने समय को देखने की एक समग्र दृष्टि एवं विषय वैविध्य दिखाई देता है, पर अपने इस गुण के साथ अपने भाव की अभिव्यक्ति में वह पूरी तरह एक नारी मन की कोमलता से काम लेती हैं, जो उनकी कविताओं को उनके समय की कवियित्रियों से अलग खड़ा करती है।
कुछ नहीं पाती
सिवाय आत्म संतुष्टि के
क्या मोमबत्ती में
नहीं हैं लक्षण
एक माँ होने के
इस संग्रह की कविताएँ नारी के पक्ष में खड़ी होकर पुरूष एवं पुरुष प्रधान समाज के ख़िलाफ़ झंडा नहीं उठातीं, बल्कि स्त्री एवं के पुरुष दोनों के अस्तित्व को उनके गुण-दोषों के साथ स्वीकार करती हैं एवं साथ-साथ चलकर अपने समय के समाज का चेहरा ही नहीं उसकी आत्मा भी बदलना चाहती हैं।
दिन भर की मेहनत के बाद
अभी-अभी सोया है
धरती के बिछौने पर
आकाश को लपेटे हुए
वह देखो वहाँ सोया है
मेरे देश का कर्णधार
बंद कर दो यह कोलाहल
थोड़ा उसे सोने दो
उसे काम करना है
संवारना है वर्तमान
॰॰॰॰॰॰और भविष्य देश का।
नमिता अपने सफ़र में अकेली नहीं हैं, वह अपने घर, परिवार और समाज के साथ चलती हैं, पर इस सफ़र में वह अपने हमसफ़र से सवाल करना नहीं भूलतीं।
समय की रेत पर
तुम्हारे पद चिन्हों के पीछे-पीछे
मैं भी चलती चली गई
चुपचाप, आँखे मूंदे हुए॰॰॰॰॰
तुम्हारी मेरे प्रति बेफ़िक्री
ख़ैर जो भी हो
तुम मेरे एक सवाल का जवाब दो
क्या तुम भी चल सकते हो
मेरे पद चिन्हों पर?
मेरे पीछे?
चुपचाप आँखे मूंदे?
नमिता ने प्रेम कविताएँ भी लिखी हैं पर वे भी बहुत सजग एव सधी हुई अभिव्यक्ति के साथ आगे बढ़ती हैं। उनमें अतिश्योक्तिपूर्ण भावाभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, वह आज की उस नारी का प्रेम है जो अपने नारीत्व से एवं उसकी शक्ति से परिचित है।
मैं एक समुद्र हूँ
न जाने अपने में
क्या-क्या छिपाए
मोती, सीप, चट्टानें, पत्थर
तुम चाहो तो गोताखोर बन सकते हो
उतर कर उसकी गहराई में
ढूँढ सकते हो मोती
पा सकते हो बहुत कुछ
या किनारे से ही
फेंक सकते हो पत्थर
और खा सकते हो छींटे ॰॰॰॰ खारे पानी के
नमिता की कविताओं में सच्चे मोती छुपे हैं पर वे भाषाई करिश्मों के, साहित्यिक आडम्बरों के या अलंकारों की चमक वाले मोती नहीं हैं। वे गहन अभिव्यक्ति के, सच्चे अनुभवों के, कवि मन में बसी स्मृतियों के मोती हैं। इसलिये आडम्बरों के और प्रतिमानों के किनारे बैठ कर नमिता की कविताओं को टटोलने वालों को समुद्र के खारे पानी के छींटे ही मिलेंगे। संग्रह में एक लम्बी कविता 'पहल' है जो कवियित्री के लेखन के भविष्य की ओर इशारा करते हुए एक नई उम्मीद बंधाती है, जिसमें कविता महज़ कविता न रहकर एक आह्वान बन जाती है। नमिता अभी लिख रही हैं, इसलिए आने वाले समय में कई सोपान पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होंगे। इसी आशा के साथ
- विवेक मिश्र

